
रामलला के सिपाही-3: मस्जिद में मूर्ति रखने से राम मंदिर की पहली ईंट रखने तक, हर कहानी में मिलेंगे परमहंस रामचंद्र दास
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1949 में मूर्ति के प्रकट होने, फिर 1950 में रामलला के पूजन करने की स्वीकृति मिलने, 1986 में राम मंदिर के ताले खुलवाने से लेकर 1992 में विवादित ढांचा गिराए जाने तक की कहानी में जो एक किरदार हर घटना में कॉमन रूप से मौजदू रहे, वो संत परमहंस दास रामचंद्र जी ही थे.
अयोध्या में 23 दिसंबर 1949 की सुबह कुछ अलग थी. बाबरी मस्जिद की ओर जा रहा हर रास्ता प्रकट भये राम कृपाला से गुंजायमान था. शहर का हर शख्स जल्दी से जल्दी रामजन्मभूमि की ओर जाना चाहता था. लोगों में कौतूहल था कि राम लला की जो मूर्ति रहस्यमय तरीके से विवादित मस्जिद में प्रकट हुई है, वह दिखती कैसी है? इस पूरे सस्पेंस को जिस संत ने अपने हाथों से रचा था, वह राम मंदिर के लिए पहली ईंट रखने तक की दास्तान में भूमिका निभाता रहा. आइये, जानें उन्हीं संत परमहंस दास रामचंद्र के व्यक्तित्व और उनके संघर्ष की कहानी को.
हालांकि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण 500 साल के संघर्ष का परिणाम है. हजारों लोगों ने मंदिर के लिए कुर्बानियां दी हैं. सैकड़ों लोगों के अथक परिश्रम से अयोध्या में राम मंदिर का सपना साकार हो रहा है. पर अगर राम मंदिर निर्माण का श्रेय केवल एक आदमी को देने की बात हो तो निश्चित रूप से परमहंस रामचंद्र दास का नाम ही लिया जाएगा.1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्ति के प्रकट होने से लेकर बाबरी मस्जिद के विध्वंस तक अगर देश का कोई एक शख्स राम मंदिर के हर काज में काम आया तो वो परमहंस रामचंद्र दास ही थे. मूर्ति रखवाने से लेकर मंदिर की लड़ाई को आम जनता की लड़ाई बनाने तक में रामचंद्र दास की बहुत बड़ी भूमिका रही है.
बाबा ने रखवाई थी मूर्ति और कोर्ट से पूजा की इजाजत भी ली
फिलहाल रामजन्मभूमि के गर्भ गृह में मूर्तियां रखवाने के आरोप में महंत अभिराम दास, रामसकल दास, सुदर्शन दास सहित करीब 50 अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई. जाहिर है कि इन संतों का काम इनके जूनियर संतों ने ही किया होगा. जूनियर संतों में उस समय सबसे अगुआ थे परमहंस रामचंद्र दास जी. हालांकि उन्हें कभी आरोपी नहीं बनाया गया पर बाद में उन्होंने 1991 में न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए गए इंटरव्यू में कहा था कि मैं ही हूं जिसने मस्जिद में मूर्ति को रखा था.
मूर्ति रखने की बात रामचंद्र दास जी ने भले कभी कभी बोल दी हो पर वो इसका श्रेय लेने की कोशिश नहीं करते थे. हमेशा इस मसले पर चुप्पी साध लेते थे. पर 16 जनवरी 1950 को सिविल जज की अदालत में हिंदू पक्ष की ओर से मुकदमा दायर कर जन्मभूमि में स्थापित भगवान राम और अन्य मूर्तियों को न हटाने और पूजा की इजाजत देने की मांग रामचंद्रदास जी ने ही की थी. दिगंबर अखाड़ा के महंत रहे परमहंस को कोर्ट ने इजाजत भी दे दी. कई साल बाद 1989 में जब रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने स्वयं भगवान राम की मूर्ति को न्यायिक व्यक्ति करार देते हुए नया मुकदमा दायर किया तब कहीं परमहंस ने अपना केस वापस लिया.
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