
महाराष्ट्र में कांग्रेस को बड़ा झटका, MLC प्रज्ञा सातव ने छोड़ी पार्टी, विधान परिषद में LoP का दावा होगा कमजोर!
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महाराष्ट्र में दिवंगत नेता राजीव सातव की पत्नी और विधान परिषद सदस्य (MLC) डॉ फुल स्टॉप प्रज्ञा सातव ने गुरुवार को पार्टी से इस्तीफा देकर बीजेपी का दामन थाम लिया. कांग्रेस का दावा है कि ये उनके नेता प्रतिपक्ष पद के दावे को कमजोर करने की साजिश करार दिया है.
महाराष्ट्र में कांग्रेस को स्थानीय निकाय चुनावों से ठीक पहले बड़ा झटका लगा है. दिवंगत कांग्रेस नेता और राहुल गांधी के करीबी राजीव सातव की पत्नी डॉ. प्रज्ञा सातव ने गुरुवार को विधान परिषद सदस्य (MLC) पद से इस्तीफा दे दिया और भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गई हैं. उनका MLC कार्यकाल 2030 तक था, लेकिन उन्होंने हिंगोली के विकास को कारण बताते हुए ये कदम उठाया. प्रज्ञा सातव ने BJP में शामिल होने की घोषणा करते हुए कहा, 'हिंगोली के विकास के लिए मैं BJP जॉइन कर रही हूं. मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है. मैंने कांग्रेस से किसी भी नेता से बात नहीं की है. शीतकालीन सत्र के बाद मैंने अपने कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और ये फैसला लिया.' वह BJP मुख्यालय में पार्टी की सदस्यता ग्रहण करेंगी.
LoP के दावे को कमजोर करने की कोशिश वहीं, कांग्रेस ने इसे BJP की सुनियोजित साजिश करार दिया है. पार्टी का आरोप है कि प्रज्ञा सातव का इस्तीफा विधान परिषद में कांग्रेस के विपक्ष के नेता (LoP) पद के दावे को कमजोर करने के लिए कराया गया है. कांग्रेस MLC भाई जगताप ने कहा, "ये स्पष्ट है कि हम विपक्ष में हैं, इसलिए LoP कांग्रेस का ही होगा. BJP इसे लेकर बहाना बना रही है कि सदन में संख्या कम है, लेकिन ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. स्वस्थ लोकतंत्र के लिए LoP का पद जरूरी है." बता दें कि इस साल सितंबर में शिवसेना के यूबीटी विपक्ष के नेता अंबदास दानवे का कार्यकाल अगस्त में खत्म होने के बाद कांग्रेस ने विधान परिषद में विपक्ष के नेता (एलओपी) पद पर अपना दावा पेश किया है.
दिवंगत कांग्रेस नेता राजीव सातव 2014 से 2019 तक हिंगोली से सांसद रहे और गांधी परिवार के बहुत करीबी माने जाते थे. 2021 में कोविड से उनकी असामयिक मौत के बाद कांग्रेस ने प्रज्ञा सातव को राजनीति में मौका दिया गया. 2021 के उपचुनाव में उन्हें निर्विरोध MLC चुना गया और 2024 में फिर विधान परिषद में सेवा करने का मौका दिया गया. उनका कार्यकाल 2030 तक था. वहीं, हिंगोली जो कभी कांग्रेस का मजबूत गढ़ था. लेकिन पिछले चार महीनों में यहां राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल गए हैं. ये दल-बदल कांग्रेस के लिए मराठवाड़ा क्षेत्र में बड़ा नुकसान माना जा रहा है.

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