
'भारत दुनिया भर में बहुत अच्छा कर रहा...', मैकाले माइंडसेट पर बहस के बीच बोले विलियम डेलरिम्पल
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इस हफ़्ते की शुरुआत में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को गुलामी की उस सोच से आज़ाद कराने के लिए देश भर में एक संकल्प लेने की अपील की थी, जिसे मैकाले ने 1835 में देश पर थोपा था.
स्कॉटलैंड के लेखक और इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने कहा है कि भारत के कई भाषाएं बोलने वाले पढ़े-लिखे अमीर लोग, जो इंग्लिश और अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में बराबर सहज हैं, ग्लोबल आर्थिक मंच पर देश के आगे बढ़ने में अहम भूमिका निभा रहे हैं. उनका यह बयान थॉमस मैकाले की विरासत पर नई बहस के बीच आया है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में भारतीयों से 'मैकाले द्वारा भारत पर थोपी गई गुलामी की सोच से खुद को आज़ाद करने' की अपील की थी और मैकाले के शिक्षा सुधारों की 200वीं सालगिरह तक 10 साल के राष्ट्रीय संकल्प का आह्वान किया था.
PM 1835 में मैकाले शिक्षा प्रणाली की शुरुआत का ज़िक्र कर रहे थे, जिसने इंग्लिश को पढ़ाई का जरिया बनाया और पारंपरिक भारतीय पढ़ाई के बजाय पश्चिमी साहित्य और विज्ञान को प्राथमिकता दी.
'नया भारत एक ऐसा भारत है...'
भाषा, कॉलोनियल असर और आत्मविश्वास पर चल रही पब्लिक बातचीत के बारे में बोलते हुए, डेलरिम्पल ने कहा कि आज भारत को एक ऐसी पीढ़ी लीड कर रही है, जो अपनी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना इंटरनेशनल लेवल पर आगे बढ़ रही है. उन्होंने कहा, "नया भारत एक ऐसा भारत है, जो अमेरिका में हर बड़े बिज़नेस पर कब्ज़ा कर रहा है और दुनिया भर में बहुत अच्छा कर रहा है. ये वे लोग हैं, जो भारत को उसके अगले फेज़ में ले जा रहे हैं."
उन्होंने कहा कि भारत की ताकत इंग्लिश और रीजनल भाषाओं में से किसी एक को चुनने में नहीं, बल्कि दोनों का इस्तेमाल करने में है.
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की अलग-अलग भारतीय साहित्यिक परंपराओं को दिखाने की कोशिशों की ओर इशारा करते हुए डेलरिम्पल ने कहा, "यह सही है कि लोगों को अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को कम नहीं समझना चाहिए और उन्हें क्षेत्रीय भाषा के साहित्य का जश्न मनाना चाहिए. लेकिन यह भी ज़रूरी है कि पढ़े-लिखे एलीट लोग इंटरनेशनल लेवल पर डील कर सकें और दुनिया भर के बिज़नेस पर कब्ज़ा कर सकें. यह एक या दूसरे का सवाल नहीं है, यह दोनों होना चाहिए और यही भारत की एक बड़ी ताकत है."

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