
बॉयकॉट इंडिया से वेलकम मोदी तक... मुइज्जू की वो 5 मजबूरियां जो भारत-मालदीव को फिर करीब ले आई
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2023 में मालदीव के राष्ट्रपति बने मोहम्मद मुइज्जू को कुछ ही महीनों में समझ में आ गया कि मालदीव की सरकार भारत की मदद के बिना नहीं चल पाती है. एक समय ऐसा आया जब मालदीव का विदेशी मुद्रा भंडार मात्र 440 मिलियन डॉलर बचा था. जिससे मात्र 45 दिनों का आयात संभव था. ऐसे में भारत ने ही मालदीव की मदद की.
दो साल ही गुजरे हैं जब मालदीव के मौजूदा राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू चुनाव अभियान के दौरान भारत के खिलाफ हाथ धोकर पड़े थे. 2023 में मालदीव के राष्ट्रीय चुनावों में 'इंडिया आउट' का नारा दिया था. मुइज्जू का यह अभियान मालदीव में भारतीय सैनिकों की मौजूदगी के खिलाफ था. तब उन्होंने कहा था कि वे सत्ता में आते ही मालदीव में मौजूद भारतीय सैनिकों वापस लौटाएंगे. गौरतलब है कि 77 भारतीय सैनिकों की एक टुकड़ी मालदीव में मौजूद थी.
मोहम्मद मुइज्जू को चीन का हिमायती माना जाता था, उन्होंने मालदीव चुनाव में भारतीय कंपनियों की मौजूदगी का मुद्दा बढ़ चढ़कर उठाया था. राष्ट्रपति बनने के बाद मोहम्मद मुइज्जू परंपरा को बदलते हुए अपनी पहली यात्रा पर दिसंबर 2023 में तुर्की गए, फिर जनवरी 2024 में उन्होंने चीन की यात्रा की. जबकि मालदीव में रवायत ये थी कि नए राष्ट्राध्यक्ष पहले भारत का दौरा करते थे.
मोहम्मद मुइज्जू का ये कदम बताता था कि वे मालदीव को भारत से दूर ले जा रहे हैं. इसके बाद मालदीव के मंत्रियों के बयान पीएम मोदी को लेकर आए जो गरिमा के विपरीत थे.
लेकिन साल 2023 से 2025 के बीच राष्ट्रपति मोइज्जू को और मालदीव के थिंक टैंक को भारत को नजरअंदाज करने का मतलब समझ में आ गया. शुक्रवार को पीएम मोदी जब मालदीव की राजधानी माले पहुंचे तो उनके स्वागत के लिए मालदीव की पूरी सरकार पलक पांवड़े बिछाए तैयार थी.
खुद राष्ट्रपति मुइज्जू, मालदीव के विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री, गृह मंत्री एयरपोर्ट पर मौजूद थे. दो साल से कम समय में भी मोइज्जू की बायकॉट इंडिया की नीति, 'वेलकम मोदी' में तब्दील हो गई.
आखिर क्या वजह रही जो राष्ट्रपति मोइज्जू को 18-20 महीनों में भारत को लेकर अपनी गलतियों को सुधारने पर मजूबर होना पड़ा.

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