
फैसला मालेगांव ब्लास्ट ही नहीं, 'भगवा आतंकवाद' वाली राजनीति पर भी आया है
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17 साल तक चले मालेगांव ब्लास्ट केस के सभी आरोपी बरी कर दिए गए हैं. कोर्ट का कहना है कि आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे. केस का कानूनी पक्ष तो अपनी जगह है, ये फैसला भगवा आतंकवाद के राजनीतिक नैरेटिव पर भी सवाल खड़े करता है.
मालेगांव ब्लास्ट केस के सभी 7 आरोपी बरी कर दिये गये हैं. अपने फैसले में स्पेशल NIA कोर्ट ने कहा है, 'कोई भी सबूत विश्वसनीय नहीं है.' अदालत ने अभिनव भारत संस्था को भी मालेगांव ब्लास्ट के आरोपों से बरी कर दिया. ये सिर्फ प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल प्रसाद पुरोहित के लिए ही राहत की बात नहीं है, बल्कि स्पेशल कोर्ट के फैसले के प्रभाव का दायरा काफी बड़ा है - क्योंकि ये मामला महज एक ब्लास्ट से कहीं आगे बढ़कर 'भगवा आतंक' के उदाहरण के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा था.
ये तब की बात है जब महाराष्ट्र में कांग्रेस और केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार थी. महाराष्ट्र में बम विस्फोट और आतंकवादी हमलों की कई घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन मालेगांव ब्लास्ट के बाद भगवा आतंक बताकर हिंदूवादी संगठनों को राजनीतिक रूप से निशाना बनाया गया.
ऑपरेशन सिंदूर पर बहस के दौरान 24 घंटे पहले ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है, कांग्रेस ने वोटबैंक की राजनीति के लिए भगवा आतंकवाद का झूठा सिद्धांत गढ़ा... हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता है.
मालेगांव केस पर आये फैसले ने एक बार फिर बीजेपी और कांग्रेस को आमने सामने ला दिया है. ये फैसला जहां बीजेपी को हिंदू विरोधी राजनीति पर हमले का मौका दे रहा है, वहीं कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को बचाव की मुद्रा में ला दिया है.
पूर्व बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर के लिए ये बहुत बड़ा दिन है, और एक अन्य आरोपी कर्नल प्रसाद पुरोहित के लिए भी. मालेगांव ब्लास्ट केस में सात आरोपी थे - भोपाल से बीजेपी सांसद रह चुकीं साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय, सुधाकर चतुर्वेदी, अजय राहिरकर, सुधाकर धर द्विवेदी और समीर कुलकर्णी.
स्पेशल कोर्ट के फैसले में क्या है

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