
पुणे पोर्श कांड: नाबालिग को ऑब्जर्वेशन होम से रिहा करने की मांग, बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका
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नाबालिग की चाची के वकील ने कहा कि, नाबालिग को हर संभव तरीके से संरक्षण देने की जरूरत थी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कानून के साथ किसी भी टकराव की वजह से वह किसी गंभीर अपराधी में न बदल जाए. "उसे उसके दादा की कस्टडी से छीनकर कैसे एक पर्यवेक्षण गृह में रखा जा सकता है.
महाराष्ट्र सरकार ने पिछले महीने 19 मई को पोर्श दुर्घटना मामले में शामिल नाबालिग की चाची द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की मेंटेनबिलिटी का विरोध किया है. नाबालिग को पहले जमानत दे दी गई थी, लेकिन लोगों को बढ़ते प्रेशर में उसे 22 मई को उसे दोबारा प्रेक्षण गृह में रखा गया है. याचिका में कहा गया है कि नाबालिग की चाची पूजा जैन ने नाबालिग को "घोर गैरकानूनी और मनमानी हिरासत और कैद" से मुक्त करने की मांग की है.
जैन की याचिका शुक्रवार को बॉम्बे हाई कोर्ट में जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की पीठ के सामने सुनवाई के लिए आई. जैन की ओर से पेश वकील आबाद पोंडा ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के प्रावधानों के मद्देनजर, नाबालिग को पुलिस स्टेशन या अवलोकन गृह में हिरासत में नहीं लिया जा सकता था.
पोंडा ने आगे कहा कि नाबालिग को हर संभव तरीके से संरक्षण देने की जरूरत थी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कानून के साथ किसी भी टकराव की वजह से वह किसी गंभीर अपराधी में न बदल जाए. "उसे उसके दादा की कस्टडी से छीनकर कैसे एक पर्यवेक्षण गृह में रखा जा सकता है, वह भी 19 मई 2024 के पहले के आदेश को वापस लेते हुए, यह कुछ ऐसा है जो पूरी तरह से कानून का उल्लंघन है और इस अदालत को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.
याचिका में कहा गया है कि पहले के जमानत आदेश को वापस लेने के लिए पुणे पुलिस का 22 मई का आवेदन कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं था, हालांकि विशेष न्यायाधीश मीडिया रिपोर्टों से प्रभावित थे. याचिका में यह भी कहा गया है कि सार्वजनिक मंचों पर मौजूद सामग्री से पता चलता है कि न केवल नाबालिग और उसके परिवार को निशाना बनाया गया है, "बल्कि एक न्यायिक अधिकारी और न्यायपालिका का भी अत्यधिक अपमानजनक तरीके से मजाक उड़ाया गया है," जहां अधिकारी को मीडिया द्वारा परेशान किया गया था. याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट का हस्तक्षेप "न्याय की भावना की रक्षा के लिए आवश्यक है.
हालाँकि मुख्य लोक अभियोजक हितेन वेनेगांवकर और राज्य की ओर से पेश वकील आयुष केडिया ने याचिका के गुण-दोष के साथ-साथ बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के रूप में इसकी स्थिरता के पहले पहलू पर विरोध किया है. याचिका में कहा गया है कि परिवार पहले ही लोगों की हेट के खिलाफ काफी पीड़ा सह चुका है. याचिका में आगे प्रार्थना की गई है कि अभियोजन एजेंसी और अदालत सार्वजनिक हंगामे के आगे न झुकें. याचिका पर पीठ अगले सप्ताह विस्तार से सुनवाई करेगी.

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