
ट्रंप ने ईरान-इजरायल युद्ध नहीं रुकवाया, सिर्फ अपनी जान छुड़ाई है!
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सरप्राइजिंग सीजफायर ऐलान को 24 घंटे से ज्यादा का वक्त बीत गया है. सीजफायर उल्लंघन के आरोपों के बाद अब शांति है. एक बड़े तूफान से पहले की खामोशी जैसा. क्योंकि, इस युद्ध से जिस नतीजे की आस इसके सभी पक्षों को थी, उनमें से किसी ने कुछ हांसिल नहीं हो पाया है. ऊपर से किसके पास कितनी ताकत है, उसे लेकर अब तक बंद रही मुट्ठी खुल चुकी है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सरप्राइजिंग सीजफायर ऐलान के छह घंटे बाद खबर आई कि इजरायल के बीरशेवा शहर पर ईरानी मिसाइल गिरने से 9 लोगों की मौत हो गई है. फिर ईरान की ओर से भी इजरायल पर सीजफायर उल्लंघन का आरोप लगाया गया. दोनों ओर से जारी हमलों के बाद लगा कि ट्रंप के सीजफायर को कोई पक्ष मानने को तैयार नहीं है. उधर ट्रंप ने भी इजरायल के रवैये के प्रति नाखुशी जाहिर कर दी. फिर फिर धीरे धीरे दोनों ओर से खामोशी अख्तियार की गई. लेकिन, मंगलवार को ही अमेरिकी खुफिया विभाग की एक रिपोर्ट से अमेरिकी खासकर ट्रंप खेमे में खलबली मच गई कि अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर जो हमला किया है, उससे कुछ खास नुकसान नहीं हुआ है. इस रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए ट्रंप ने कहा कि हमने ईरान के परमाणु प्रोग्राम को ध्वस्त कर दिया. जबकि इजरायली सेना प्रमुख ने कहा कि उनके देश को इस बात की पुख्ता पड़ताल में वक्त लगेगा. हां, ईरान के परमाणु और मिसाइल प्रोग्राम को कुछ वर्ष पीछे जरूर धकेल दिया गया है. इधर, ईरान में जीत का जश्न मनाया जा रहा है. कहा जा रहा है कि ईरानी जज्बे के आगे अमेरिका और इजरायल को सीजफायर के लिए मजबूर होना पड़ा है. कुल मिलाकर ईरान और इजरायल-अमेरिकी गठजोड़ के बीच 12 दिन तक चला युद्ध बेनतीजा खत्म तो हो गया. लेकिन, इसने कई बड़े संग्राम के बीज बो दिये हैं. सीजफायर की घोषणा करके ट्रंप अपनी पीठ थपथपा रहे हैं. लेकिन, उन्हें न इजरायल में इज्जत मिल रही है और न ही ईरान में. ऐसे में मिडिल-ईस्ट के बाकी देशों को भी अपने भविष्य को लेकर आशंकित होना लाजमी है.
नेतन्याहू ने ट्रंप को जैसे फंसाया, वैसे ही वो बच निकले
ईरान-इजरायल युद्ध की शुरुआत और कथित खात्मे के बैकग्राउंड को एक बार समझते हैं. ओमान में जब ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु संधि को लेकर बातचीत चल रही होती है, उसी दौरान इजरायल तेहरान पर हवाई हमले कर देता है. जिसमें ईरान के सेनाध्यक्ष और कई परमाणु वैज्ञानिकों को मार दिया जाता है. इजरायल दावा करता है कि परमाणु संधि की बातचीत ईरान का एक छलावा है, जिसकी आड़ में वह परमाणु बम बनाने की करीब पहुंचता जा रहा है. नतीजा यह होता है कि न चाहते हुए भी ट्रंप को इजरायल की इस कार्रवाई का समर्थन करना पड़ता है और यह घोषणा करनी पड़ती है कि इजरायली हमले की उसे जानकारी थी और यह उनके समर्थन से हुआ है.
दुनिया में डीलमेकर और पीसमेकर (शांति के मसीहा) बनने की चाह लिए घूम रहे डोनाल्ड ट्रंप के लिए इजरायल-ईरान युद्ध चौंकाने वाला था. यह उनके लिए किसी पेपर में आउट ऑफ सिलैबस वाला मामला था. नेतन्याहू की चली चाल में ट्रंप फंस चुके थे. इधर कुआं, उधर खाई वाली हालत. समझ नहीं आ रहा था कि यदि वे इस युद्ध में पूरी तरह शामिल हुए तो हासिल क्या कर लेंगे?
सीजफायर का ऐलान करना कैसे ट्रंप की मजबूरी बन गया था
हर हाल में इजरायल की हर तरह से मदद करना अमेरिका की स्थायी नीति रही है. चाह कर भी डोनाल्ड ट्रंप इससे किनारा नहीं कर सकते थे. ऐसे में 12 दिन के युद्ध में इजरायल को अमेरिका हथियारों और उसके युद्धक विमानों को हमले के दौरान अमेरिका हवा में रिफ्यूलिंग करता रहा. फिर ईरान के परमाणु ठिकानों पर अपने B-2 बॉम्बर विमानों से हमला करके युद्ध में शामिल भी हुआ. जिसका जवाब ईरान ने इराक और कतर स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमला कर दिया. लेकिन, रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि इन दोनों ही हमलों में किसी का कुछ खास नहीं बिगड़ा. न तो ईरानी परमाणु कार्यक्रम को कोई स्थायी नुकसान पहुंचा और न ही ईरानी हमलों से यूएस के सैन्य ठिकानों पर किसी तरह की हानि हुई. सीजफायर को लेकर ट्रंप ने सोशल मीडिया पर जिस तरह कमेंट किया है, उससे लगता है कि जैसे यूएस के सैन्य ठिकानों पर ईरान के मिसाइल हमले बड़ी फिक्सिंग का हिस्सा थे. ईरान ने इन हमलों से पहले यूएस को बता दिया था. जिससे खुश होकर ट्रंप ने सीजफायर का ऐलान कर दिया.

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