
ट्रंप और जेलेंस्की के लिए कितनी मायने रखती है मिनरल डील, US-यूक्रेन का क्या दांव पर?
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कीव, इस समझौते के हिस्से के रूप में अमेरिका से सुरक्षा गारंटी चाहता है- ट्रंप इसे उस सहायता के बदले 'भुगतान' के तौर पर देख रहे हैं जो युद्ध के दौरान अमेरिका ने कीव को दी है. ट्रंप ने कई बार दावा किया है कि अमेरिका ने यूक्रेन को 350 अरब डॉलर भेजे हैं, हालांकि इस आंकड़े की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई. जबकि अमेरिकी कांग्रेस ने रूस के 2022 में पूर्ण पैमाने पर किए गए हमले के बाद से अब तक 175 अरब डॉलर की सहायता को मंजूरी दी है.
यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोदिमीर जेलेंस्की ने सोमवार (28 अप्रैल) को कहा कि अमेरिका के साथ यूक्रेन के खनिज संसाधनों के विकास को लेकर जो समझौता हो रहा है, वह अब 'ज्यादा मजबूत और न्यायसंगत' बन गया है. यह बात दोनों देशों के बीच चली हालिया बातचीत के बाद सामने आई.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दबाव बनाते हुए कहा है कि अगर अमेरिका को उसके खर्च का कोई फायदा नहीं मिला, तो वह यूक्रेन को दी जा रही सैन्य मदद रोक सकते हैं. अमेरिका यूक्रेन को रूस से चल रही लड़ाई में अब तक अरबों डॉलर की सैन्य मदद दे चुका है.
खनिजों पर निर्भर यूक्रेन का बजट
यह समझौता यूक्रेन के लिए बहुत संवेदनशील है, क्योंकि वहां कोयला और लौह अयस्क (iron ore) के खनन का एक पुराना इतिहास रहा है. अब यूक्रेन उन दुर्लभ खनिजों को निकालने की तैयारी कर रहा है, जिनकी दुनिया में मांग लगातार बढ़ रही है. खनिज देश के बजट का एक अहम हिस्सा हैं.
क्रिवी रीह से ताल्लुक रखने वाले राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा कि 18 अप्रैल को साइन किए गए एक समझौता ज्ञापन के बाद अमेरिका के लिए एक खनिज राजस्व कोष (Mineral Revenue Fund) बनाने की दिशा में प्रगति हुई है, जिससे अमेरिका को हिस्सा मिलेगा.
यूक्रेन के प्रधानमंत्री डेनीस श्मिहाल ने रविवार को कहा कि अब इस बात पर सहमति हो गई है कि यह डील अमेरिका द्वारा अतीत में दी गई सहायता की भरपाई के रूप में नहीं होगी. यह बयान उन यूक्रेनवासियों को राहत दे सकता है जो मानते हैं कि 2022 से वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों के लिए भी रूस से लड़ रहे हैं- उन पश्चिमी देशों में नाटो जैसे अमेरिका-नेतृत्व वाले रक्षा गठबंधन और यूरोपीय देश शामिल हैं, जिनसे यूक्रेन गहराई से जुड़ाव महसूस करता है.

लेकिन अब ये कहानी उल्टी घूमने लगी है और हो ये रहा है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों ने अमेरिका से जो US BONDS खरीदे थे, उन्हें इन देशों ने बेचना शुरू कर दिया है और इन्हें बेचकर भारत और चाइना को जो पैसा मिल रहा है, उससे वो सोना खरीद रहे हैं और क्योंकि दुनिया के अलग अलग केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़ी मात्रा में सोना खरीदा जा रहा है इसलिए सोने की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि हो रही हैं.

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