जेलों में बढ़ती कैदियों की भीड़ और न्याय में देरी बनी मुसीबत, संसदीय पैनल ने जताई चिंता
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बीजेपी सांसद बृजलाल की अध्यक्षता वाली गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने सिफारिश की है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तर्ज पर गर्भवती महिलाओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए. यानी जेल में गर्भवती महिला और फिर जच्चा-बच्चा के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए.
जेलों में बढ़ती कैदियों की संख्या और न्याय में देरी एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है. एक संसदीय पैनल ने पाया है कि इसके चलते कैदियों और पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए कई परिणाम सामने आ रहे हैं. बीजेपी सांसद बृजलाल की अध्यक्षता वाली गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने सिफारिश की है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तर्ज पर गर्भवती महिलाओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए. यानी जेल में गर्भवती महिला और फिर जच्चा-बच्चा के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए.
साथ ही समिति की सिफारिश है कि भीड़भाड़ वाली जेलों से कैदियों को उसी राज्य या अन्य राज्यों में खाली जेलों में शिफ्ट किया जाना चाहिए. इसके लिए राज्यों से समझौता होना चाहिए, ताकि वह इस तरह की स्थिति होने पर कैदी को अपने यहां की जेल में रखने से इनकार न करें.
न्यूज एजेंसी के मुताबिक पैनल ने सिफारिश की कि जेल में पैदा हुए बच्चों को 12 साल की उम्र तक उनकी मां के साथ रहने की अनुमति दी जाए, ताकि उनके कल्याण और विकास को सुनिश्चित करते हुए उनके शुरुआती वर्षों के दौरान पोषण संबंधी वातावरण प्रदान किया जा सके.
गाइडलाइंस के मुताबिक, खाना, आश्रय, चिकित्सा देखभाल, शिक्षा और शारीरिक विकास से संबंधित बच्चों की उचित देखभाल पर जोर दिया जाना चाहिए. इसके अलावा इन बच्चों को खेल और मनोरंजन की सुविधाएं भी मुहैया कराई जानी हैं.
समिति ने यह भी कहा कि ट्रांसजेंडर कैदियों को अन्य कैदियों के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य देखभाल के समान मानक प्रदान किए जाने चाहिए और उनकी लिंग पहचान के आधार पर भेदभाव किए बिना आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं को उपलब्ध कराना चाहिए.
बता दें कि समिति ने पाया है कि भारतीय जेलों में अत्यधिक भीड़ ने लंबे समय से देश की आपराधिक न्याय प्रणाली को परेशान किया है. जेलों से कैदियों की संख्या कम करने के लिए विभिन्न कदमों के बावजूद, भारत की जेलों में कुल कैदी क्षमता 4.25 लाख की तुलना में 5.54 लाख है.

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