
क्या डोल गया है ममता बनर्जी का आत्मविश्वास? INDIA गुट के बाद रामकृष्ण मिशन मुद्दे पर भी लिया यू-टर्न
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क्या ममता बनर्जी का सख्त व्यक्तित्व अचानक नरम पड़ने लगा है. इंडिया गठबंधन को लेकर जिस तरह उन्होंने 24 घंटे के अंदर 2 तरह की बातें कीं, ठीक उसी तरह उन्होंने रामकृष्ण मिशन के मुद्दे पर अपने बयान से पलट गईं हैं. आखिर बंगाल में क्या हो रहा है?
पश्चिम बंगाल में आधे से अधिक सीटों पर मतदान हो चुका है. पर मतदान के अंतिम चरण में पहुंचने तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी अपने व्यक्तित्व से अलग नजर आ रही हैं. अपनी हर कही हुई बात पर मजबूती से दृढ़ रहने वाली ममता अपने बयानों को बार-बार बदल रही हैं. पिछले हफ्ते के उनके बयानों पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि उनका आत्मविश्वास डिगा हुआ है. पहले इंडिया गठबंधन को लेकर दिए गए उनके बयान अविश्वसनीय लगे ही थे पर रामकृष्ण मिशन मुद्दे पर तो वह पूरी तरह बैकफुट पर दिखीं. उन्होंने अपने बयान से जिस तरह यू-टर्न लिया वो बिल्कुल उनके व्यक्तित्व से अलग है. रामकृष्ण मिशन और भारत सेवाश्रम संघ की आलोचना पर केवल बीजेपी ने ही नहीं कांग्रेस ने भी जिस तरह उन्हें टार्गेट पर लिया है उन्हें वैसी उम्मीद नहीं रही होगी. अब ममता बनर्जी को महसूस हो रहा होगा कि काश उन्होंने इंडिया गठबंधन से अलग चुनाव लड़ने की बात नहीं की होती. कम से कम ऐसे मौके पर कांग्रेस और वाम दलों का साथ तो मिलता.
रामकृष्ण मिशन और सेवाश्रम संघ का विरोध कर फंसी
ममता बनर्जी हिंदू संगठनों को टार्गेट पर लेती रही हैं. यह उनके लिए कोई नई बात नहीं है. पर रामकृष्ण मिशन के संतों पर अनावश्यक बोलकर वह बुरी तरह फंस गई हैं. स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन बंगाल की जन-जन में समाया हुआ है. स्वामी विवेकानंद आज भी बंगाली युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं. पर इन सबसे इतर ममता ने श्री रामकृष्ण की पत्नी सारदा देवी के जन्मस्थान, हुगली के जयरामबाटी में शनिवार को एक रैली में कार्तिक महाराज को निशाने पर ले लिया.
ममता कहती हैं कि वह कहते हैं कि वह किसी भी टीएमसी एजेंट को मतदान केंद्रों में अनुमति नहीं देंगे. मैं उन्हें साधु नहीं मानती क्योंकि वह सीधे तौर पर राजनीति में शामिल हैं और देश को बर्बाद कर रहे हैं.'उन्होंने आगे कहा कि रामकृष्ण मिशन के सदस्यों को निर्देश दिल्ली से मिलते हैं. ममता ने कहा कि रामकृष्ण मिशन और भारत सेवाश्रम संघ के कुछ भिक्षु दिल्ली में भाजपा नेताओं के प्रभाव में काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह कुछ लोगों का काम है, हालांकि उनके मन में इन दोनों संगठनों के लिए सम्मान है.
सोमवार आते आते ममता बनर्जी को लगा कि उनकी बातों का गलत मतलब निकाला जा रहा है और फिर वो सफाई देने पर उतर गईं. उन्होंने कहा कि मैंने किसी संस्था के खिलाफ कुछ नहीं कहा है. मैं रामकृष्ण मिशन के ख़िलाफ़ नहीं हूं. मैंने अभी कार्तिक महाराज जैसे कुछ व्यक्तियों के बारे में बात की थी. क्योंकि मुझे बताया गया था कि उन्होंने कहा है कि वह टीएमसी एजेंटों को मतदान केंद्रों में अनुमति नहीं देंगे. धर्म की आड़ में वह भाजपा के लिए काम कर रहे हैं. उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने का पूरा अधिकार है. लेकिन उन्हें भगवा वस्त्र के पीछे शरण लेने के बजाय सार्वजनिक रूप से कमल के प्रतीक को अपनाना चाहिए.
इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार कार्तिक महाराज ने एक बयान में कहा कि अपने पूरे जीवन में खुद को मानव सेवा के लिए समर्पित कर दिया है. वे हिंदू अध्यात्म की प्राचीन शैली की पूर्ण गरिमा को कायम रखते हुए वर्तमान हिंदू समाज को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं. एक ओर जहां उनमें अपनी मातृभूमि के प्रति गहरा प्रेम है. दूसरी ओर, वह मानवता के प्रति सहानुभूति रखते हैं और सामाजिक सुधार में लगे हुए हैं.

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