
कट्टरवाद, इंडिया विरोध और पाक-चीन की कठपुतली... तख्तापलट के एक साल बाद बांग्लादेश किस हाल में?
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शेख हसीना की सरकार के पतन के एक साल पूरे हो गए. यह समय न सिर्फ बांग्लादेश के लिए निराश भरे रहे बल्कि यहां की आजाद हवा और सेकुलर ताने बाने में कट्टरवाद का असर बढ़ा. अल्पसंख्यक हिन्दुओं का दमन हुआ. बांग्लादेश की विदेश नीति ने लगभग यू टर्न लिया और मोहम्मद यूनुस अब पाकिस्तानी हुक्मरानों के स्वागत के लिए रेड कारपेट बिछा रहे हैं.
5 अगस्त 2024. यानी की वो तारीख जिसने बांग्लादेश का इतिहास बदल दिया. पिछले साल इसी दिन बांग्लादेश में लंबे आंदोलन, सैकड़ों हत्याओं के बाद शेख हसीना की सरकार का पतन हो गया था. आधुनिक इतिहास में ऐसा कम उदाहरण ही होगा जहां छात्रों के आंदोलन से एक देश की निर्वाचित सरकार को जाना पड़ा है.
बांग्लादेश का ये आंदोलन वहां के लिए उम्मीदों की बयार लेकर आया था. लगभग 15 साल से सत्ता में रही शेख हसीना की सरकार के तख्तापलट होने के बाद ढाका में एक नई व्यवस्था की उम्मीद जगी थी. इस रिजीम चेंज की कमान जब नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस को मिली तो आशाएं और भी बढ़ गईं.
लेकिन पिछले एक साल न सिर्फ बांग्लादेश के लिए निराश भरे रहे बल्कि ढाका की आजाद हवा में कट्टरवाद का असर बढ़ा. यहां अल्पसंख्यक हिन्दुओं का दमन हुआ. बांग्लादेश की विदेश नीति ने लगभग यू टर्न लिया और जिस पाकिस्तान से बतौर स्वतंत्र देश के रूप में वजूद में आने के लिए बांग्लादेश ने लाखों कुर्बानियां दी, मोहम्मद यूनुस उसी पाकिस्तान के साथ गलबहियां करने लगे.
मोहम्मद यूनुस की नीतियों ने भारत विरोध को हवा दिया और शेख हसीना को बांग्लादेश भेजने पर दोनों देशों के बीच तीखी बयानबाजियां हुईं.
आइए बांग्लादेश के एक साल के घटनाक्रम को समझते हैं?
कट्टरवाद का उभार और हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले

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