
उमेश पाल हत्याकांड के बाद सामने आया एक और गवाह, बोला- राजू पाल के मर्डर को मैंने देखा, UP सरकार से मांगी सुरक्षा
AajTak
कौशांबी जिले के चकपिन्हा गांव के निवासी ओम प्रकाश पाल ने एक वीडियो में यह दावा किया है कि वह भी राजू पाल हत्याकांड का गवाह है. खुद को गवाह बताने वाले ओम प्रकाश ने उमेश पाल की दिनदहाड़े हत्या के बाद खुद की जान को खतरा होने का दावा करते हुए राज्य सरकार से सुरक्षा की मांग की है.
साल 2005 में बसपा विधायक राजू पाल हत्याकांड में गवाह होने का दावा करने वाले एक व्यक्ति ने योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार से सुरक्षा की मांग की है. इस व्यक्ति की पहचान कौशांबी जिले के चकपिन्हा गांव के निवासी ओम प्रकाश पाल के रूप में हुई है, जिसने एक वायरल वीडियो में यह दावा किया है कि वह भी राजू पाल हत्याकांड का गवाह है.
एएसपी समर बहादुर ने कहा कि पुलिस ने वायरल वीडियो का संज्ञान लिया है और उससे संपर्क करने का प्रयास किया जा रहा है. उन्होंने कहा, 'एक वीडियो वायरल हो रहा है, उसमें बताया जा रहा है कि वह राजू पाल हत्याकांड का गवाह है.'
खुद को बताया मुख्य गवाह
खुद को गवाह बताने वाले ओम प्रकाश ने उमेश पाल की दिनदहाड़े हत्या के बाद खुद की जान को खतरा होने का दावा करते हुए राज्य सरकार से सुरक्षा की मांग की है. उमेश पाल ने दावा किया कि गैंगस्टर अतीक अहमद का शूटर अब्दुल कवि पास के एक गांव में रहता था और सालों से पुलिस की पहुंच से दूर है. उन्होंने आगे दावा किया कि अब्दुल ने 2020 में राजू पाल हत्याकांड में गवाही नहीं देने की धमकी दी थी. उसके न मानने पर अब्दुल ने उस पर गोली चला दी और ओम प्रकाश अपनी जान बचाने के लिए भाग गया.
अब्दुल की तलाश में UP पुलिस
उसकी शिकायत के बाद सरायकिल कोतवाली में एक मामला भी दर्ज किया गया था जिसके बाद पुलिस ने अब्दुल को पकड़ने के प्रयास किए. पुलिस ने उसके सिर पर 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया है. तीन मार्च को उसके आने की सूचना मिलने पर पुलिस ने उसके आवास पर छापा मारा था. उसके घर के अंदर से बम सहित अवैध हथियार बरामद किए गए हैं.

नोएडा केवल उत्तर प्रदेश का शो विंडो नहीं है, बल्कि प्रति व्यक्ति आय, प्रति व्यक्ति कंज्यूमर शॉपिंग, प्रति व्यक्ति इनकम टैक्स, प्रति व्यक्ति जीएसटी वसूली आदि में यह शहर देश के चुनिंदा टॉप शहरों में से एक है. पर एक शहरी की जिंदगी की सुरक्षा की गारंटी नहीं देता है. बल्कि जब उसकी जान जा रही हो तो सड़क के किनारे मूकदर्शक बना देखता रहता है.

उत्तर प्रदेश की सरकार और ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच चल रहे विवाद में नई उर्जा आई है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने खुली चुनौती के साथ योगी आदित्यनाथ को उनके शंकराचार्य होने पर सवाल उठाए हैं. इस मुद्दे ने राजनीति में तेजी से हलचल मचा दी है जहां विपक्ष शंकराचार्य के समर्थन में खड़ा है जबकि भाजपा चुप्पी साधे हुए है. दूसरी ओर, शंकराचार्य के विरोधी भी सक्रिय हुए हैं और वे दावा कर रहे हैं कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ही सच्चे स्वयंभू शंकराचार्य हैं.

उत्तर प्रदेश की सियासत में उल्टी गंगा बहने लगी है. मौनी अमावस्या के दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के स्नान को लेकर हुआ विवाद अब बड़ा मुद्दा बन गया है. जहां खुद अविमुक्तेश्वरानंद के तेवर सरकार पर तल्ख हैं, तो वहीं बीजेपी पर शंकराचार्य के अपमान को लेकर समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रयागराज में संगम नोज तक पालकी पर जाकर स्नान करने से उन्हें रोका था.

झारखंड के लातेहार जिले के भैंसादोन गांव में ग्रामीणों ने एलएलसी कंपनी के अधिकारियों और कर्मियों को बंधक बना लिया. ग्रामीणों का आरोप था कि कंपनी बिना ग्राम सभा की अनुमति गांव में आकर लोगों को ठगने और जमीन हड़पने की कोशिश कर रही थी. पुलिस के हस्तक्षेप के बाद लगभग दो घंटे में अधिकारी सुरक्षित गांव से बाहर निकल सके.

दिल्ली के सदर बाजार में गोरखीमल धनपत राय की दुकान की रस्सी आज़ादी के बाद से ध्वजारोहण में निरंतर उपयोग की जाती है. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के बाद यह रस्सी नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाने लगी. इस रस्सी को सेना पूरी सम्मान के साथ लेने आती है, जो इसकी ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्ता को दर्शाता है. सदर बाजार की यह रस्सी भारत के स्वाधीनता संग्राम और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बनी हुई है. देखिए रिपोर्ट.

संभल में दंगा मामले के बाद सीजेएम के तबादले को लेकर विवाद शुरू हो गया है. पुलिस के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए गए थे लेकिन पुलिस ने कार्रवाई नहीं की. इस पर सीजेएम का अचानक तबादला हुआ और वकील प्रदर्शन कर रहे हैं. समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और AIMIM ने न्यायपालिका पर दबाव बनाने का आरोप लगाया है. इस विवाद में राजनीतिक सियासत भी जुड़ी है. हाई कोर्ट के आदेशानुसार जजों के ट्रांसफर होते हैं लेकिन इस बार बहस हुई कि क्या यहां राज्य सरकार ने हस्तक्षेप किया.







