
ईरान पर हमले का फैसला क्यों नहीं ले पा रहे ट्रंप? कहां कमजोर पड़ रहे हैं अमेरिका-इजरायल
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ट्रंप को पता है कि ईरान से अगर युद्ध में फंसे तो वहां से निकलना मुश्किल होगा. अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका ने काफी कुछ गंवाया है. दूसरे ट्रंप खुद को शांति के मसीहा के रूप में स्थापित करना चाहते हैं. उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार की तलब हो गई है. यही कारण है कि भारत-पाक में सीजफायर का श्रेय लेने के लिए करीब बीसियों बार बयान दे चुके हैं. फिर भी दुनिया उन्हें घास नहीं डाल रही है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ईरान पर हमले को लेकर लगातार कन्फ्यूज दिख रहे हैं. कभी उनका इशारा होता है कि ईरान पर बहुत बड़ा हमला होने वाला है, पूरा तेहरान खाली करने को कहने लगते हैं. कभी ईरान को मोहलत देते दिखते हैं. शुक्रवार को एक बार फिर ट्रंप ईरान को 2 सप्ताह की मोहलत देते दिख रहे हैं. जबकि ईरान लगातार इजरायल पर हमले करते जा रहा है. इजरायल ने अपने जन्म के बाद से कभी भी इस तरह के हमले नहीं देखा था.
दुनिया भर को ऐसा लग रहा था अमेरिका बहुत जल्द खुलकर इस युद्ध में शामिल हो जाएगा. पर ऐसा होता दिख नहीं रहा है. जाहिर है कि सवाल उठ रहे हैं कि क्या मध्य एशिया में अमेरिका कमजोर पड़ रहा है? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां और बयानबाजी हमेशा से अनिश्चितता और विरोधाभास से भरी रहती हैं. ईरान पर हमले को लेकर ट्रंप की नीतियों में अनिश्चितता और विरोधाभास कई कारणों से उभरकर सामने आए हैं.
पूर्व में ट्रंप बार-बार ईरान के साथ कूटनीतिक समाधान की वकालत करते रहे हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने ईरान को परमाणु समझौते के लिए 60 दिन का समय दिया था, जो 13 जून को समाप्त हुआ. लेकिन इजरायल के हमले के बाद, ट्रंप ने इसे समर्थन दिया, यह कहते हुए कि वह हमले की योजना से पूरी तरह वाकिफ थे. एक तरफ तो वे ईरान के साथ बातचीत कर रहे थे, समझौते की वकालत कर रहे थे तो दूसरी तरफ सैन्य कार्रवाई का समर्थन भी .इस तरह की बातों के चलते ट्रंप ने खुद को बहुत जटिल बना दिया है.
ट्रंप की अनिश्चितता के पीछे बहुत से कारण
ट्रंप के मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) मुहिम से जुड़े लोग इजरायल के समर्थन को लेकर विभाजित हैं. 14 जून 2025 को अल जज़ीरा लिखता है कि मार्जोरी टेलर ग्रीन और चार्ली कर्क जैसे उनके समर्थक मध्य पूर्व में युद्ध के खिलाफ हैं. ट्रंप का कोई भी समर्थक यह नहीं चाहता है कि देश युद्ध में फंसे. क्योंकि यह अमेरिका फर्स्ट सिद्धांत के विपरीत है. ट्रंप की अनिश्चितता इस आंतरिक दबाव को दर्शाती है, क्योंकि वह अपने समर्थकों को नाराज नहीं करना चाहते.
इससे भी खास बात यह है कि डोनाल्ड ट्रंप की इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी नहीं पटती है. न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, ट्रंप ने शुरू में इजरायल के हमले का विरोध किया था, क्योंकि ट्रंप की योजनाओं में यह युद्ध आड़े आ रहा था. माना जा रहा है कि इजरायल ने बिना अमेरिका से परामर्श लिए और बिना उसकी सहायता के ईरान पर हमला किया, जिससे ट्रंप की स्थिति अमेरिका में कमजोर हुई. बाद में, उन्होंने इसे समर्थन देकर अपनी छवि बचाने की कोशिश की.

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