
आरोपी को केस की जानकारी नहीं देने का मामला, SC ने ED को लगाई फटकार
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सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) पर सवाल उठाते हुए कहा कि जमानत के दौरान आरोपियों को दस्तावेज न देने से उनकी मौलिक स्वतंत्रता का हनन हो सकता है. कोर्ट ने मामला सुरक्षित रखते हुए पारदर्शिता और निष्पक्षता पर जोर दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय के वर्किंग स्टाइल पर सवाल उठाए और चिंता जताई कि क्या जमानत के चरण में आरोपियों को अहम दस्तावेज न देना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनकी मौलिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है? इस टिप्पणी के साथ ही अदालत ने एक मनी लॉन्ड्रिंग केस में अस्पष्ट या अधूरे दस्तावेजों के प्रावधान से संबंधित अपील पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है.
मामले पर जस्टिस अभय एस ओका, एहसानुद्दीन अमानुल्ला, और अगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने सुनवाई की और आने वाले दिनों में फैसला सुनाएगी. बेंच ने ईडी के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा, "कई बार ऐसा दस्तावेज हो सकता है जो ईडी के पास हो, लेकिन चार्जशीट दाखिल करने के बाद वे दस्तावेज आरोपियों को नहीं दिया जाता. क्या इससे उसके अनुच्छेद 21 के अधिकार का उल्लंघन नहीं होता?"
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सुप्रीम कोर्ट में ईडी का तर्क
सुनवाई के दौरान, ईडी का प्रतिनिधित्व कर रहे अपर सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू ने तर्क दिया कि दस्तावेजों के प्रावधान का विरोध नहीं है, लेकिन आरोपियों को बिना उचित कारण के सभी दस्तावेज मांगने का अधिकार नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा कि आरोपी सिर्फ आवश्यक दस्तावेज ही मांग सकते हैं.
हालांकि, बेंच ने इस नजरिए पर आपत्ति जताई. जस्टिस ओका ने कहा, "समय बदल गया है. हम किस हद तक कह सकते हैं कि दस्तावेजों को संरक्षित किया जाना चाहिए? क्या हम इतने कठोर होंगे कि आरोपी को दस्तावेजों का एक्सेस नहीं मिलेगा? क्या यह न्याय है?"

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