
अंगूर अड्डा, अफगान बाबरी, नूरिस्तान... पाक-अफगान सीमा की वो जमीन जहां नक्शा नहीं, ताकत तय करती है बॉर्डर!
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अफगानिस्तान और तालिबान का बॉर्डर 1893 में खींचा गया. लगबग सवा सौ साल गुजर जाने के बाद भी ये रेखा दो इस्लामी देशों के बीच कट्टर दुश्मनी की वजह बनी है. ऐतिहासिक दर्रों, नदियों, पहाड़ों और घाटियों से होकर गुजरती इस रेखा ने कागज पर जमीन के दो टुकड़े तो कर दिए, लेकिन यहां मालिकाना हक उसी का रहा, जिसके पास ताकत रही.
डूरंड लाइन के दोनों किनारों पर बारूद की गंध तो कम हो गई है, लेकिन तनाव जरा भी कम नहीं हुआ है. अफगानिस्तान-पाकिस्तान की ताजा भिडंत ने इस इलाके के वर्षों पुराने इतिहास और लगभग उतनी ही पुरानी अदावत को ताजा कर दिया है. 26 फरवरी की रात को अफगानिस्तान-पाकिस्तान ने डूरंड लाइन के किनारे मौजूद एक दूसरे की चौकियों को बमों से पाट दिया.
अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बीच जहां जंग हुई है वहां इलाके भूगोल जंग के नतीजे तय करता है. दरअसल टैरेन यहां का राजा है. यहां का टैरेन दुश्मन को छकाता है, हमलावर को थकाता है, और जो यहां की वादियों से वाकिफ है उसे पुरस्कृत करता है.
पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने जमीन के बंटवारे के लिए यहां डूरंड लाइन के नाम से लकीर तो जरूर खींच दी है, लेकिन कबीलाई संस्कृति से प्रभावित इस इलाके में लाइनों का ज्यादा महत्व नहीं है. अफगानिस्तान डूरंड लाइन को औपचारिक मान्यता नहीं देता है. यहां की चौकियां पर कब्जा उसी का होता है, जिसके पास ताकत होती है. यही वजह है कि दो मुल्कों के बीच 2640 किलोमीटर लंबी इस सीमा रेखा पर जिस मुल्क की जहां मर्जी होती है वहां घुस जाता है. जब चाहे चौकियों पर कब्जा कर लेता है. क्योंकि यहां अफगान-पाकिस्तान की संप्रभुता महज लकीर के खींच देने से नहीं बल्कि ताकत से तय होती है.
26-27 फरवरी की लड़ाई में पाकिस्तान का दावा है कि उसने दर्जन से ज्यादा चौकियां नष्ट कर दी है और कुछ चौकियों पर कब्जा कर लिया है.
इनमें अंगूर अड्डा में अफगान अल्फा पोस्ट, अफगान चार्ली पोस्ट, अफगान बाबरी पोस्ट को नष्ट या कैप्चर करने का दावा पाकिस्तान ने किया है.
अफगानिस्तान के पक्तिया प्रांत में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के अंदर 5 पोस्ट्स कैप्चर करने का दावा किया है. इनमें दो पोस्ट सावल के सामने और जर्मलान के सामने के पोस्ट भी शामिल हैं.

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