
NCERT Books: बाबरी मस्जिद अब होगी 'तीन गुंबद वाली संरचना', क्या कहेंगे आजाद पाकिस्तान को?
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पिछली किताब में बाबरी मस्जिद को मुगल बादशाह बाबर के जनरल मीर बाक़ी द्वारा बनवाई गई 16वीं सदी की मस्जिद बताया गया था।.संशोधित अध्याय में अब इसे "श्री राम की जन्मभूमि पर 1528 में बनी तीन गुंबद वाली संरचना बताया गया है, जिसके अंदर और बाहर हिंदू प्रतीकों और अवशेषों की स्पष्ट झलक दिखती है
पिछले हफ़्ते जारी की गई एनसीईआरटी की कक्षा 12 की राजनीति विज्ञान की नई संशोधित पाठ्यपुस्तक में बाबरी मस्जिद का नाम हटा दिया गया है. इसके बजाय इसे “तीन गुंबद वाली संरचना” बताया गया है. वहीं, अयोध्या खंड को चार पन्नों से घटाकर दो कर दिया गया है, साथ ही पिछले संस्करण से महत्वपूर्ण विवरण हटा दिए गए हैं.
पिछली किताब में बाबरी मस्जिद को मुगल बादशाह बाबर के जनरल मीर बाक़ी द्वारा बनवाई गई 16वीं सदी की मस्जिद बताया गया था. वहीं संशोधित अध्याय में अब इसे "श्री राम की जन्मभूमि पर 1528 में बनी तीन गुंबद वाली संरचना बताया गया है, जिसके अंदर और बाहर हिंदू प्रतीकों और अवशेषों की स्पष्ट झलक दिखती है.
इससे पहले, पाठ्यपुस्तक में दो पृष्ठ फैजाबाद (अब अयोध्या) जिला अदालत द्वारा फरवरी 1986 में मस्जिद का ताला खोलने के आदेश के बाद “दोनों पक्षों” की लामबंदी का वर्णन करते थे. इसमें सांप्रदायिक तनाव, सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा, दिसंबर 1992 में राम मंदिर बनाने के लिए स्वयंसेवकों द्वारा की गई कारसेवा, मस्जिद का विध्वंस और जनवरी 1993 में हुई सांप्रदायिक हिंसा का विस्तार से वर्णन किया गया था. इसमें भाजपा द्वारा “अयोध्या में हुई घटनाओं पर खेद” व्यक्त करने और “धर्मनिरपेक्षता पर गंभीर बहस” का भी उल्लेख किया गया था.
इसे इस प्रकार बदला गया है:
“1986 में, तीन गुंबद वाले ढांचे को लेकर स्थिति ने तब महत्वपूर्ण मोड़ ले लिया जब फैजाबाद (अब अयोध्या) जिला अदालत ने इसे खोलने का फैसला सुनाया, जिससे वहां पूजा की अनुमति मिल गई. यह विवाद दशकों तक चला, जिसमें दावा किया गया कि तीन गुंबद वाला ढांचा श्री राम के जन्मस्थान पर एक मंदिर को ध्वस्त करने के बाद बनाया गया था. यद्यपि मंदिर के लिए शिलान्यास किया गया था, लेकिन आगे के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. हिंदू समुदाय को लगा कि श्री राम के जन्मस्थान के बारे में उनकी चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया गया, जबकि मुस्लिम समुदाय ने संरचना पर अपने कब्जे का आश्वासन मांगा. स्वामित्व को लेकर दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ गया, जिससे कई विवाद और कानूनी लड़ाइयांं हुईं. दोनों समुदायों ने निष्पक्ष समाधान की मांग की. फिर 1992 में, ढांचे के विध्वंस के बाद, कुछ आलोचकों ने तर्क दिया कि यह भारतीय लोकतांत्रिक सिद्धांतों के लिए एक बड़ी चुनौती है.”
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