
Azamgarh bypoll: बसपा के लिए पथरीली कैसे बन गई कभी मुफीद रही आजमगढ़ की जमीन?
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आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव (Azamgarh byelection) को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं. आजमगढ़ भले ही सपा का मजबूत गढ़ माना जाता हो, लेकिन बसपा के लिए यहां की सियासी जमीन हमेशा से उपजाऊ रही है. हालांकि, वक्त के साथ-साथ बसपा कमजोर हुई तो आजमगढ़ की जमीन भी पथरीली हो गई. ऐसे में मायावती ने एक बार फिर से दलित-मुस्लिम समीकरण के जरिए राजनीतिक दांव चला है.
उत्तर प्रदेश की आजमगढ़ लोकसभा सीट के लिए हो रहे उपचुनाव पर सबकी नजरें लगी हुई हैं. आजमगढ़ को सपा का गढ़ और मुलायम परिवार का मजबूत दुर्ग माना जाता है. मोदी लहर हो या योगी लहर कभी भी आजमगढ़ में बीजेपी अच्छा नहीं कर पाई है, लेकिन बसपा के लिए यहां की सियासी जमीन हमेशा से उपजाऊ रही है. बसपा एक नहीं बल्कि 4 बार अपना सांसद यहां पर बनाने में कामयाब रही है, लेकिन पार्टी लिए अब यह जमीन पथरीली बनती जा रही है. ऐसे में बसपा ने शाह आलम (गुड्डू जमाली) को उपचुनाव में उतारकर दलित-मुस्लिम समीकरण का दांव खेला है?
आजमगढ़ उपचुनाव का सियासी समीकरण
अखिलेश यादव के इस्तीफे से खाली हुई आजमगढ़ लोकसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव में सपा ने पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव को मैदान में उतारा है. बीजेपी ने अपने पिछले चुनाव के प्रत्याशी दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ पर ही दांव खेल रखा है. बसपा ने मुबारकपुर से दो बार के विधायक रहे गुड्डू जमाली को उतारकर मुकाबले को रोचक बना दिया है.
वहीं, कांग्रेस चुनावी मैदान से बाहर है. ऐसे में सपा, बसपा और बीजेपी तीनों ने चुनाव में प्रचार के लिए पूरी फौज उतार रखी है, जिसके चलते आजमगढ़ की लड़ाई में कोई किसी से कमजोर नहीं दिखना चाहता.
बता दें कि सपा के सियासी वजूद में आने से पहले ही बसपा आजमगढ़ में अपनी सियासी जड़ें जमा चुकी थी. कांशीराम ने आजमगढ़ को दलित राजनीति के सियासी प्रयोगशाला के तौर पर भी स्थापित किया था, जिसके चलते बसपा गठन के पांच साल के बाद ही आजमगढ़ संसदीय सीट पर जीत दर्ज करने में सफल रही थी. 1989 से 2019 तक इस सीट पर कभी सपा तो कभी बसपा का कब्जा रहा और बीच में एक बार 1991 में जनता दल और 2009 में एक बार बीजेपी जीती है. इस तरह से आजमगढ़ का मुकाबला सपा और बसपा के बीच ही सिमटा रहा.
बसपा और सपा की आजमगढ़ में परफॉर्मेंस

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