
हम भी हैं गौरा देवी...जलते जंगल को बचाने वाली चार पहाड़ी महिलाओं की कहानी
BBC
इस साल सर्दियों के बावजूद भी उत्तराखंड के जंगल जगह-जगह जल रहे थे. इनमें चमोली के नौरख गांव के पास वाला जंगल भी शामिल था.लेकिन गांव की कुछ महिलाओं ने अपनी जान की परवाह किए बगैर न सिर्फ़ इसे बुझाया बल्कि आसपास के पर्यावरण को भी नष्ट होने से बचा लिया.
"जंगल जलता देखकर गांव वाले दु:ख तो जता रहे थे लेकिन वहां जाकर आग बुझाने के बारे में कोई नहीं सोच रहा था. जबकि आग तीन दिन से लगी हुई थी. दिन में तो आग दिखाई नहीं देती, सिर्फ धुआं-धुआं सा लगता. लेकिन रात को लपटें दिखतीं तो पता चलता कि आग बहुत फैली हुई है."
ये शब्द हैं चमोली के नौरख गांव की रहने वाली रीना देवी के.
22 साल की रीना देवी को यह आग देखकर डर लग रहा था, लेकिन इससे भागने की जगह चार सहेलियों ने मिलकर जंगल की इस आग को बुझाने का फ़ैसला किया.
इस साल सर्दियों के बावजूद भी उत्तराखंड के जंगल जगह-जगह जल रहे थे और दशोली ब्लॉक में नौरख गांव का जंगल जनवरी महीने में तीन दिन से आग की चपेट में था. इस गांव में क़रीब तीन सौ परिवार रहते हैं.
बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
रीना देवी बताती हैं, "जंगल हमारे गांव के पीछे है. घर के पीछे ही हम वहां से लाई हुई घास इकट्ठा करके रखते हैं. एक चिंगारी भी आती तो उसके जलने का ख़तरा हो सकता था."
अपनी तीन साथियों जमुना, ममता और गुड्डी के साथ रीना रोज़ाना घास और लकड़ी लाने जंगल जाती हैं.
