
सालों अटकने के बाद फिर दिख रहे EU और भारत में ट्रेड डील के तगड़े आसार, लेकिन कहां फंस सकती है बात?
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अमेरिका की ट्रेड को लेकर दादागिरी दूसरे किसी देश पर भले चल जाए, लेकिन भारत ये धौंस कतई नहीं सहेगा. उसने अमेरिका के साथ व्यापार के विकल्प खोजने शुरू कर दिए. इसमें चीन से लेकर यूरोपियन यूनियन (ईयू) भी विकल्प हैं. आज से बेल्जियम में दोनों पक्षों के बीच बातचीत शुरू हो चुकी.
भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौता जल्द ही आकार ले सकता है. ये साझा दिलचस्पी है, जिसकी एक वजह अमेरिका भी है. जब से ट्रेड वॉर के नाम पर उसने देशों को धमकाना शुरू किया, तब से काफी सारे मुल्क एक पाले में दिखने लगे हैं. हालांकि ईयू को लेकर भारतीय उम्मीदों में आशंका का भी तड़का लगा हुआ है. एक दशक पहले भी उसके साथ हमारी डील आखिर तक पहुंचकर रुक गई थी.
क्या है मुक्त व्यापार समझौता यह दो या ज्यादा देशों के बीच होने वाला वो समझौता है, जिसमें वे आपस में व्यापार पर लगने वाले टैक्स, ड्यूटी या रोक-टोक कम या लगभग खत्म कर देते हैं. इससे फायदा ये होता है कि दोनों देशों के उत्पाद एक-दूसरे के बाजार में आसानी से पहुंच पाते हैं. जैसे अगर भारत और यूरोपीय संघ के बीच फ्री ट्रेड डील होती है, तो भारत से कपड़े, दवाएं या आईटी सेवाएं यूरोप में सस्ती पड़ेंगी और यूरोप की कारें, मशीनें या शराब भारत में सस्ती मिलेंगी. इससे दोनों की कंपनियों और कस्टमर्स को फायदा होगा.
क्यों दोनों के लिए विन-विन सिचुएशन
फिलहाल अमेरिकी आक्रामकता के बीच यूरोप भी भरोसेमंद साथी खोज रहा है. दूसरी तरफ, भारत भी अमेरिका से दूरी चाह रहा है. ये समझौता दो सताए हुए पक्षों का मेल हो सकता है, जो बाकी तरह से भी प्रोडक्टिव होगा.
लेकिन भारत–ईयू एफटीए सुनने में जितना सुहाना लग रहा है, उसके रास्ते उतने ही कंटीले हैं. इसकी वजह है यूरोप का इतिहास. साल 2007 में भी दोनों के बीच ये बातचीत शुरू हुई थी. इस समझौते को ब्रॉड-बेस्ड ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट एग्रीमेंट (BTIA) कहा गया. इसका मकसद था कि दोनों के बीच व्यापार और निवेश को और खुला बनाया जाए. लेकिन 6 साल चलने के बाद आखिरकार साल 2013 में बातचीत बंद हो गई.
दरअसल यूरोपीय संघ चाहता था कि भारत उसे अपने बाजार में ज्यादा खुले तरीके से काम करने दे. इधर भारत को डर था कि अगर उसने ऐसा किया तो उसकी अपनी कंपनियां और छोटे कारोबार यूरोपीय कंपनियों के सामने टिक नहीं पाएंगे. यही से टकराव शुरू हुआ.

लेकिन अब ये कहानी उल्टी घूमने लगी है और हो ये रहा है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों ने अमेरिका से जो US BONDS खरीदे थे, उन्हें इन देशों ने बेचना शुरू कर दिया है और इन्हें बेचकर भारत और चाइना को जो पैसा मिल रहा है, उससे वो सोना खरीद रहे हैं और क्योंकि दुनिया के अलग अलग केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़ी मात्रा में सोना खरीदा जा रहा है इसलिए सोने की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि हो रही हैं.

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