
संडे व्यू: भारत की चुप्पी ‘रहस्यमयी’, करोड़ों वयस्क वोटर गैरवोटर कैसे?
The Quint
Sunday View: ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष को लेकर भारत के रुख पर मुकुल केशवन से लेकर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पर पी चिदंबरम तक के विचारों का सार. इसके साथ ही पढ़ें, श्याम सरन, करन थापर और चेतन भगत के विचारों का सार.
मुकुल केशवन ने टेलीग्राफ में लिखा है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष के प्रति भारत सरकार की चुप्पी रहस्यमयी और चिंताजनक है. यह भारत के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है. भारत अपनी ऊर्जा (तेल और गैस) और उर्वरक (फर्टिलाइजर) की जरूरतों के लिए खाड़ी देशों और 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Strait of Hormuz) पर निर्भर है. इस युद्ध और ब्लॉकेड के कारण न केवल ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी, बल्कि खेती के लिए जरूरी गैस की कमी से भारत की खाद्य सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी.
लेखक चीन का उदाहरण रखते हैं जिसने अपनी ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए दोनों पक्षों पर सवाल उठाए. शशि थरूर जैसे विचारकों द्वारा इस चुप्पी को 'यथार्थवाद' (Realism) कहना लेखक की नजर में गलत है, क्योंकि अमेरिका के प्रति इस समर्पण से भारत को चीन या व्यापार के मोर्चे पर कोई ठोस लाभ नहीं मिला है. लेखक का मानना है कि भारत की यह रहस्यमयी चुप्पी कोई रणनीतिक समझदारी नहीं, बल्कि गैर-जिम्मेदाराना शासनकला है. अमेरिका के पीछे आंख मूंदकर चलना भारत के लिए आर्थिक और कूटनीतिक रूप से विनाशकारी हो सकता है. इसे लेखक ने 'आत्मसमर्पण' जैसा बताया है.
पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर पर सवाल उठाया है कि भारत में करोड़ों वयस्क गैर वोटर कैसे हो सकते हैं. चिदंबरम का मुख्य तर्क यह है कि मतदाता सूची में दर्ज मतदाताओं की संख्या राज्य की अनुमानित वयस्क जनसंख्या के लगभग बराबर होनी चाहिए. योगेंद्र यादव के आंकड़ों का हवाला देते हुए वे बताते हैं कि हालिया पुनरीक्षण (SIR) के बाद मतदाता सूची और वास्तविक वयस्क जनसंख्या के बीच औसतन 10% का भारी अंतर देखा गया है. इसका अर्थ है कि लाखों पात्र नागरिक मतदाता सूची से बाहर हैं.
