
मिडिल ईस्ट में युद्ध लंबा खिंचा तो चरम पर होगी ग्लोबल मंदी
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ईरान की टॉप लीडरशिप खत्म होने के बाद भी जिस तरह ईरान ने लड़ाई जारी रखी है उससे साफ लगता है कि मिडिल ईस्ट का संकट अभी खत्म होने वाला नहीं है. जाहिर है कि यह दुनिया भर के लिए चिंताजनक है. ग्लोबल मंदी की आहट से इनकार नहीं किया जा सकता है.
वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही कोरोना महामारी, यूक्रेन युद्ध और व्यापार युद्धों की मार से उबरने की कोशिश कर रही थी कि मध्य पूर्व में छिड़ा महायुद्ध दुनिया के सामने नया संकट बनकर आ गया है. अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों ने दुनिया को एक नए आर्थिक भंवर में धकेल दिया है. अमेरिकी हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई और उनके परिवार के सदस्यों की मौत होने के बाद ईरान बदले की आग में जल रहा है. अपनी टॉप लीडरशिप खत्म होने के बाद भी जिस तरह का हौसला ईरान दिखा रहा है उससे साफ लग रहा है कि अभी युद्ध खत्म नहीं होने वाला है.
ईरान ने मिसाइलों से इज़राइल और अमेरिकी ठिकानों पर जबरदस्त पलटवार किया है. अरब देशों के सबसे सुरक्षित और महत्वपूर्ण ठिकानों पर ईरान ने लगातार बम बरसाएं हैं. दुबई , अबू धाबी और बहरीन जैसे शहर आज केवल अरब देश ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे सुरक्षित और विकसित ठिकानों में से एक माने जाते हैं. कभी किसी ने सोचा नहीं था कि ये शहर बम और मिसाइलों के निशाने पर हो सकते हैं. ये शहर ग्लोबल इकॉनमी के लिहाज से भी आज की तारीख में अपनी हैसियत रखते हैं. जाहिर है कि अरब देशों में होने वाले ये हमले दुनिया की हिली हुई अर्थव्यस्था को और भी रसातल में पहुंचाने का कारण बनने वाले हैं.
भारत में सोमवार को जिस तरह बाजार गिरा है ये तो बस नमूना है. अरब देशों के संकट से तेल की कीमतों में उछाल, मुद्रास्फीति और वैश्विक विकास दर में गिरावट होना तय है. ईरान ओपेक का चौथा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है. जाहिर है कि ईरान पर हमले ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जो दुनिया के 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति का मुख्य मार्ग है, को खतरे में डाल दिया है. ईरान ने इस जलडमरू-मध्य को बंद करने की धमकी दी है, जो पहले से ही जहाज़ों के लिए असुरक्षित हो चुका है. यदि यह बंद होता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति में भारी कमी आएगी, जिसका असर हर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.सबसे बड़ा झटका तेल बाजार को लगा है. हमलों से पहले ब्रेंट क्रूड की कीमत 67-77 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी, लेकिन अब यह 100 डॉलर तक पहुंचने की कगार पर है.
यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो कीमतें 150 डॉलर तक जा सकती हैं, जैसा कि ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स ने अनुमान लगाया है. मध्य पूर्व से निकलने वाला तेल मुख्य रूप से सऊदी अरब, इराक, यूएई और कुवैत से आता है, और होर्मुज का बंद होना इन सबको प्रभावित करेगा. ऊर्जा बाजार में यह उथल-पुथल मुद्रास्फीति को फिर से भड़काएगी. पहले से ही वैश्विक मुद्रास्फीति 2025 में 3-4 प्रतिशत के आसपास थी, लेकिन अब यह 0.6-0.7 प्रतिशत और बढ़ सकती है.
उच्च तेल कीमतें परिवहन, उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत बढ़ाती हैं, जिससे आम आदमी की जेब पर बोझ पड़ता है. यह संकट वैश्विक विकास को भी कुंद कर रहा है. आईएमएफ ने 2026 के लिए वैश्विक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 3.1 प्रतिशत रखा था, लेकिन अब यह 1.7 प्रतिशत तक गिर सकता है. एक ट्रिलियन डॉलर का वैश्विक उत्पादन नुकसान का खतरा मंडरा रहा है. स्टॉक मार्केट्स में गिरावट शुरू हो चुकी है.
अमेरिकी डॉलर का और मजबूत होना तय है. इसका असर ये होगा कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं और कमजोर पड़ेंगी. यह मुद्रा दबाव आयात को महंगा बनाता है, खासकर उन देशों के लिए जो तेल आयात पर निर्भर हैं. शिपिंग और व्यापार पर प्रभाव भी गहरा है. रेड सी और होर्मुज के रास्ते पहले से ही असुरक्षित होने से जहाज़ अफ्रीका के चक्कर लगाएंगे. यह 10-14 दिनों की अतिरिक्त देरी और 40-80 प्रतिशत अधिक लागत का कारण बन रहा है. इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होगी. फैक्ट्रियों को कच्चे माल की कमी से जूझना होगा. युद्ध नहीं रुका तो उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें बढ़नी तय हैं. एयर ट्रैवल के प्रभावित होने से टिकट महंगे हो रहे हैं. पर्यटन उद्योग भी ठप पड़ जाएगा. मिस्र जैसा देश, जो स्वेज नहर से होने वाली आय पर निर्भर है, आर्थिक संकट में फंस गया है. भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह संकट और भी घातक है. भारत अपनी 80 प्रतिशत से अधिक तेल आवश्यकता आयात करता है, मुख्य रूप से मध्य पूर्व से. उच्च तेल कीमतें मुद्रास्फीति को 6-7 प्रतिशत तक धकेल सकती हैं, रुपया कमजोर हो सकता है, जिससे स्टॉक मार्केट्स में गिरावट आएगी.

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