
भारत के गृहमंत्री की बेटी का अपहरण और 5 आतंकियों की रिहाई... वो घटना जिसने बदल दिया कश्मीर का इतिहास
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इस सीरीज के चौथे हिस्से में, जिसमें हम कश्मीर में आतंकवाद के इतिहास को समझने की कोशिश कर रहे हैं, इस बार बात करते हैं दिसंबर 1989 की उस घटना की, जिसने हालात पूरी तरह बदल दिए. इस बार याद करते हैं रूबैया सईद के किडनैप का मामला. रूबैया, उस वक्त के भारत के गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी थीं. जैसे ही उन्हें अगवा किया गया, घाटी में हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए. इस अपहरण ने सरकार को झुका दिया. ये घटना उस दौर की एक अहम कड़ी बनी, जिसने कश्मीर की तस्वीर को हमेशा के लिए बदल दिया.
मुफ़्ती मोहम्मद सईद कश्मीर की सियासत में एक अलग पहचान रखते थे. तीखी नाक, घने सफेद बाल, भारी भौंहें और गहरी आंखों वाले सईद, बिल्कुल वैसे ही दिखते थे जैसे एक वकील का चेहरा होता है और वो एक समय में वकील भी रह चुके थे. अपने लंबे राजनीतिक करियर में उन्हें कई नामों से पुकारा गया. कुछ तारीफ में, तो कुछ तंज में. वजह थी उनकी तेज महत्वाकांक्षा और बार-बार पाला बदलने की आदत.
कभी नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता रहे सईद ने कई बार पार्टी बदली और आखिर में कांग्रेस में पहुंचे. उनके इन यूटर्न्स पर कई मज़ेदार नारे भी बने. लेकिन शिया मौलवी के बेटे सईद को सिद्धांतों से ज़्यादा अपनी महत्वाकांक्षा प्यारी थी. 1987 में जब वो कांग्रेस में थे, तब उन पर मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (MUF) का अंदर से समर्थन करने का आरोप लगा- ऐसा माना गया कि वो कश्मीर की सियासत में किंगमेकर बनना चाहते थे. जब ये मौका नहीं मिला, तो उन्होंने 1989 के लोकसभा चुनावों से पहले वीपी सिंह की अगुवाई वाले 'जन मोर्चा' का दामन थाम लिया. यही फैसला बाद में उन घटनाओं की शुरुआत बना, जिसने सरकार को घुटनों पर ला दिया.
मूल रूप से अनंतनाग के बिजबेहड़ा इलाके से आने वाले मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कांग्रेस से इस्तीफा देने की सीधी वजह 1987 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुए दंगे को बताया. लेकिन असल में ये एक सोची-समझी रणनीति थी- वो पास के मुज़फ्फरनगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे. 1989 में जब वीपी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने सबको चौंका दिया. उन्होंने सईद को गृहमंत्री बनाया- आज़ाद भारत के इतिहास में ये पहली बार हुआ जब कोई मुसलमान इस पद पर पहुंचा.
जब दिसंबर के पहले हफ्ते में दिल्ली में नई सरकार ने शपथ ली, तब कश्मीर पहले से ही बेकाबू हालात की कगार पर था. टारगेट किलिंग की कई घटनाओं ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं, सरकारी कर्मचारियों और कश्मीरी पंडितों के बीच खौफ फैला दिया था (पार्ट 3 देखें). श्रीनगर की सड़कों पर कई आतंकी संगठन, खासकर जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF), खुलेआम हमले कर रहे थे.

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