
जानी दुश्मन से पहले अच्छे दोस्त थे इज़रायल-ईरान, कैसे एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लामबंद हुए दोनों मुल्क?
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तारीख़ के पन्नों में एक ऐसा दौर भी दर्ज़ है, जब ईरान और इज़रायल एक-दूसरे के सहयोगी हुआ करते थे. लेकिन साल 1979 के बाद दुश्मन बन गए. प्रॉक्सी संघर्ष, न्यूक्लियर विवाद और हालिया हमलों ने क्षेत्रीय तनाव और जंग का ख़तरा बढ़ा दिया.
मिडिल ईस्ट के दो बड़े खिलाड़ी- ईरान और इज़रायल के बीच भीषण जंग जारी है. आज दोनों मुल्क एक-दूसरे के जानी दुश्मन हैं. इस जंग का असर ख़ित्ते के अन्य देशों पर भी पड़ा है. लंबे वक़्त से इज़रायल, ईरान के साथ पश्चिम के रिश्तों को बेहतर बनाने के मकसद से किए गए सौदों की आलोचना करता रहा है. ईरान पर और ज़्यादा पाबंदियां लगाने और इसके लिए अमेरिका के साथ अपने गहरे रिश्तों का इस्तेमाल करने पर ज़ोर देता रहा है.
इज़रायल ने ईरानी शासन को अपने वजूद के लिए ख़तरा बताया है. दशकों से दोनों देश एक-दूसरे को निशाना बनाने की कोशिश करते रहे हैं, जिसमें हाल के सालों में सीधी लड़ाई भी शामिल है. 7 अक्टूबर, 2023 को इज़रायल में हमास के हमले के बाद, मिडिल ईस्ट में एक बड़े इलाके के झगड़े की चिंताएं बढ़ गई हैं, जिसके केंद्र में दोनों दुश्मन देश हैं.
हालांकि, ईरान-इज़रायल के रिश्ते हमेशा से आज जितने ख़राब नहीं रहे हैं. लेकिन इसके उलट, एक वक़्त ऐसा भी था, जब ईरान और इज़रायल न सिर्फ सहयोगी थे, बल्कि एक-दूसरे की ताक़त बनकर खड़े थे. साल 1948 में इज़रायल के वजूद में आने के बाद, शाह मोहम्मद रेजा पहलवी के नेतृत्व वाला ईरान इज़रायल को मान्यता देने वाला दूसरा मुस्लिम-बहुल देश बना.
ईरान, यूनाइटेड नेशंस की उस खास कमेटी के 11 सदस्यों में से एक था, जिसे 1947 में फ़िलिस्तीन पर ब्रिटिश कंट्रोल खत्म होने के बाद उसके लिए हल निकालने के लिए बनाया गया था.
साल 1948 में इज़रायल के बनने से पहले, ज़ायोनी मिलिशिया ने 700,000 से ज़्यादा फ़िलिस्तीनियों को उनके घरों से नस्ल के आधार पर निकाल दिया था. ज़ायोनी मिलिशिया वे सशस्त्र यहूदी समूह थे, जो ब्रिटिश शासन के दौरान फ़िलिस्तीन में एक्टिव थे. फ़िलिस्तीनी अपने ज़बरदस्ती हटाए जाने और बेदख़ली को नकबा (Nakba) कहते हैं, जिसका मतलब है- तबाही.
साल 1948 में अरब देशों के इज़रायल के बुनियादी विरोध की वजह से पहली अरब-इज़रायल जंग हुई. हालांकि, ईरान इसल लड़ाई का हिस्सा नहीं था और इज़रायल के जीतने के बाद, उसने यहूदी देश के साथ रिश्ते बनाए. तुर्की के बाद ऐसा करने वाला यह दूसरा मुस्लिम-बहुल देश था.

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