
एक INDIA गठबंधन, 4-4 कैंडिडेट...MP-राजस्थान-छत्तीसगढ़, मिजोरम में विपक्षी वोटों का उलझा गणित!
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ऐसे कई उदाहरण हैं, जब शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी इंडिया ब्लाक के उसूलों के उलट व्यवहार करते दिखे हैं, लेकिन अब जब चार राज्यों के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और देखने को मिल रहा है कि विपक्षी गठबंधन में शामिल दलों ने भी इस चुनाव में अपने अलग-अलग उम्मीदवार खड़े किए हैं.
पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है. वोटिंग के बाकी दिन अब उंगलियों की गिनती पर रह गए हैं. मध्यप्रदेश, राजस्थान, मिजोरम, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के शहरों की जनता अपना विधायक चुनेगी साथ ही अपना सीएम भी चुनेगी. इनमें से तेलंगाना को छोड़ दें तो बाकी चार राज्यों में ऐसी स्थिति बन रही है, जो न सिर्फ लोगों को असमंजस में डाल रही है, बल्कि अभी-अभी नए बने इंडिया ब्लॉक के भविष्य के लिए भी खतरे का संकेत है.
बहुत मजबूत नहीं दिख रही विपक्षी दलों की एकता असल में साल 2024 में होने वाले आम चुनावों से पहले सभी विपक्षी दल एक साथ आए और उन्होंने तय किया कि वह NDA (BJP) का विजय रथ रोकेंगे. एक तो पहले सभी विपक्षी दलों का साथ आना ही मुश्किल रहा, लेकिन ऐलानिया तौर पर जाहिर हो चुका है कि सभी विपक्षी दल साथ हैं तो भी इसमें शामिल दलों के कई ऐसे फैसले सामने आ रहे हैं, जिससे कि इन दलों की एकता बहुत मजबूत नहीं दिख रही है.
ऐसे कई उदाहरण हैं, जब शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी इंडिया ब्लाक के उसूलों के उलट व्यवहार करते दिखे हैं, लेकिन अब जब चार राज्यों के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और देखने को मिल रहा है कि विपक्षी गठबंधन में शामिल दलों ने भी इस चुनाव में अपने अलग-अलग उम्मीदवार खड़े किए हैं. जेडीयू से मिला विपक्षी गठबंधन को करारा झटका बात करें मध्य प्रदेश की तो यहां लगातार विपक्षी दल इंडिया गठबंधन के साथ अपने बागी तेवर दिखा रहे हैं. अभी ताजा मामला जेडीयू का है. असल में जेडीयू ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी है. पहली लिस्ट में जेडीयू के 5 उम्मीदवारों का नाम है. जेडीयू ने जिन पांच उम्मीदवारों की घोषणा की है उनमें पिछोर विधानसभा सीट से चंद्रपाल यादव, राजनगर से रामकुंवर (रानी) रैकवार, विजय राघवगढ़ सीट से शिव नारायण सोनी, थांदला विधानसभा सीट से तोल सिंह भूरिया और पेटलावद रामेश्वर सिंघार को उम्मीदवार बनाया है.
सपा ने भी दिखाए थे बागी तेवर जेडीयू का इस तरीके से एमपी में अपने उम्मीदवार उतारना कई सवाल खड़े करता है. सवाल इस बात का, कि क्या INDIA गठबंधन अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने से पहले ही खात्मे की कगार पर है? असल में बिहार में तो महागठबंधन के भीतर भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. ये सवाल सिर्फ जेडीयू की वजह से नहीं उठा है और न ही नीतीश कुमार की पार्टी तक सीमित है. ये सवाल इससे पहले सपा के कारण भी उठा था, जब पिछले दिनों सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ या फिर ऐसा कह लें कि इंडिया गठबंधन के साथ बागी तेवर दिखाए थे.
एमपी में सपा ने उतारे 22 उम्मीदवार सपा के साथ तो कहानी ही अलग हुई. दरअसल, एमपी में समाजवादी पार्टी ने अपने 22 उम्मीदारों के नाम का ऐलान किया था, इससे कांग्रेस बिफर गई और कहा कि अगर सपा इतनी सीटों पर चुनाव लड़ेगी तो सीधे-सीधे बीजेपी को इससे फायदा होगा. जब ये बात राजनीतिक गलियारों में फैली तो अखिलेश यादव ने कहा कि अगर हमें पता होता कि विधानसभा स्तर पर गठबंधन नहीं है तो न हम मीटिंग में जाते और न ही कांग्रेस नेताओं के फोन उठाते. कांग्रेस की इस तल्खी को लेकर अखिलेश ने कहा था कि रात 1 बजे तक कांग्रेस नेताओं ने सपा नेताओं को बैठाकर रखा और बातचीत की. आश्वासन दिया कि कांग्रेस सपा के लिए 6 सीटों पर विचार करेगी. लेकिन जब लिस्ट आई तो उसमें सपा के एक भी उम्मीदवार को जगह नहीं दी गई.
विपक्षी एकता के लिए हो चुकी हैं तीन बैठकें समाजवादी पार्टी का कहना है कि उन्हें पता ही नहीं है कि ये गठबंधन विधानसभा स्तर पर नहीं है. विपक्षी एकता के लिए अब तक तीन बैठकें हो चुकी हैं. खबरों के मुताबिक इन तीनों बैठकों में गठबंधन का एजेंडा, सीट शेयरिंग और गठबंधन कैसे काम करेगा, इस पर चर्चा हुई है, लेकिन इतनी चर्चाओं के बाद नतीजा सिफर ही रहा है. सवाल ये है कि जब घटक दलों को पता ही नहीं है कि गठबंधन विधानसभा में है या सिर्फ 2024 के लिए है या भविष्य के लिए भी है तो ऐसा कन्फ्यूजन जनता के बीच कैसे मजबूत दे पाएगा. अभी जो उदाहरण सामने रखे वह सिर्फ एक राज्य मध्य प्रदेश में कांग्रेस, सपा और जेडीयू के उदाहरण हैं. विपक्षी एकता की कन्फ्यूजन कथा यहीं तक सीमित नहीं है.

अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध का आज 23वां दिन है. अब ये जंग परमाणु प्लांट पर हमलों तक पहुंच गई है. एक दिन पहले इजरायल ने नतांज में ईरान के न्यूक्लियर प्लांट को टारगेट किया, जिसके जवाब में ईरान ने डिमोना और अराद शहरों पर भीषण हमला कर दिया. ईरान के ये हमले युद्ध को और भीषण बना सकते हैं क्योंकि अब इजरायल तेहरान में लगातार कई ठिकानों को निशाना बना रहा है. नेतन्याहू ने इस समय को इजरायल के अस्तित्व और भविष्य की लड़ाई का एक चुनौतीपूर्ण पड़ाव बताया है. वहीं ईरान दावा कर रहा है कि डिमोना और अराद पर हमले के बाद युद्ध का पूरा समीकरण बदल गया है.

आज बात पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दंगल की जहां टीएमसी और बीजेपी के बीच कड़ा मुकाबला है. बंगाल की सियासत इस वक्त अपने चरम पर है, जहां हर बयान, हर कदम और हर मंच चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुका है. कल ईद के मौके पर मंदिर -मस्जिद का रंग देखने को मिला. ममता बनर्जी ने कोलकाता में ईद के मौके पर बीजेपी के घुसपैठिए वाले मुद्दे पर अबतक का सबसे बड़ा पलटवार किया. ईद-उल-फितर के मौके पर कोलकाता के रेड रोड पर आयोजित एक बड़े धार्मिक कार्यक्रम में ममता ने पीएम मोदी को सबसे बड़ा घुसपैठिया बता दिया. ये वही मुद्दा है जिस पर पीएम मोदी लगातार ममता सरकार को घेर रहे हैं. ममता के बयान पर बीजेपी ने हार की हताशा में दिया गया बयान बताया. वहीं बीजेपी ने भी बंगाल में अपने वोटरों को मैसेज दिया है. शुभेंदु अधिकारी कालीघाट मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना की और मां काली से आशीर्वाद मांगते हुए कहा कि बंगाल में घुसकर बांग्लादेशी घुसपैठियों ने बहुत अत्याचार किया है. बंगाल में अगले महीने दो चरण में वोटिंग होनी है. ऐसे में जैसे-जैसे तारीख नजदीक आएगी, बयान और भी तीखे होंगे और सियासी चालें और भी पेचीदा. लेकिन सवाल ये कि क्या बंगाल मंदिर-मस्जिद की राजनीति से बाहर निकल पाएगी. इस बार बंगाल में किस पार्टी की नैरेटिव का सिक्का चलेगा. बीजेपी-टीएमसी की आमने-सामने की लड़ाई में आखिर कांग्रेस और कभी 34 साल तक लगातार सरकार में रहने वाली लेफ्ट क्या कर रही है.

दिल्ली में जद (यू) के पूर्व नेता केसी त्यागी ने रविवार को राष्ट्रीय लोक दल जॉइन कर लिया. उन्होंने जयंत चौधरी की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ली. इससे पहले मंगलवार को उन्होंने बिना कारण बताए जद (यू) से इस्तीफा दिया था. 2003 से पार्टी से जुड़े त्यागी महासचिव, प्रवक्ता और राजनीतिक सलाहकार जैसे अहम पदों पर रह चुके हैं.

पंजाब की मान सरकार की 'एकमुश्त निपटान स्कीम' को व्यापारियों का भारी समर्थन मिला है. पुराने टैक्स बकाये के जरिए अब तक सरकारी खजाने में 111.16 करोड़ रुपये आ चुके हैं. हालांकि, इस राहत का फायदा सिर्फ 31 मार्च तक ही उठाया जा सकता है. इसके बाद सरकार नरम रुख छोड़कर सख्त एक्शन लेगी और करीब 8,000 संपत्तियों पर कुर्की की कार्रवाई शुरू की जाएगी.

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विश्व जल दिवस पर 'जल है तो कल है' जैसे नारे सुनने में तो अच्छे लगते हैं, लेकिन जमीन पर हकीकत आज भी बहुत कड़वी है. सरकारी कागजों में 'हर घर जल' के बड़े-बड़े दावे तो दिखते हैं, पर असलियत में आज भी लोगों को प्यास बुझाने के लिए दूर-दूर तक पैदल चलना पड़ रहा है. कई परिवारों को तो पानी के लिए खुद कुएं तक खोदने पड़ रहे हैं. जब तक पानी के लिए यह जानलेवा संघर्ष और लंबी कतारें खत्म नहीं होतीं, तब तक ये जल दिवस सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख बनकर ही रह जाएगा.







