
आज का दिन: केशव प्रसाद मौर्य की हार पार्टी के भीतर उन्हें कितना नुकसान पहुंचाएगी?
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यूपी समेत 5 राज्यों के चुनाव परिणाम सामने आ चुके हैं. उत्तर प्रदेश, जनसंख्या के लिहाज़ से देश का सबसे बड़ा सूबा. यहां 37 साल बाद ऐसा हुआ है जब कोई सरकार दोबारा सत्ता में आई है. लेकिन जब दिल्ली में जब पीएम का भाषण चल रहा था उसी दौरान यूपी की सिराथू सीट पर बवाल हो रहा था.
उत्तर प्रदेश, जनसंख्या के लिहाज़ से देश का सबसे बड़ा सूबा. यहां 37 साल बाद ऐसा हुआ है जब कोई सरकार दोबारा सत्ता में आई है. बीजेपी ने यहां 273 सीटें जीती हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस जीत पर अपने कार्यकर्ताओं, अपने सहयोगी दलों का धन्यवाद दिया और फिर शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आकर आभार जताया.
दिल्ली में जब पीएम का भाषण चल रहा था उसी दौरान यूपी की सिराथू सीट पर बवाल हो रहा था. पुलिस पर बीजेपी समर्थक पत्थर फेंक रहे थे, काउंटिंग रुकवा दी गई थी, ईवीएम में गड़बड़ी की बात जो दो दिन पहले सपा कर रही थी वही बात सिराथू में बीजेपी ने शुरू कर दी . दरअसल, सिराथू सीट से प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और बीजेपी के दिग्गज नेता केशव प्रसाद मौर्य खड़े थे, जिन्हें ओबीसी लीडर के रूप में पार्टी पेश भी करती है. सामने समाजवादी पार्टी की टिकट से पल्लवी पटेल खड़ी थी जो अनुप्रिया पटेल की बहन हैं. वही अनुप्रिया पटेल जिनकी पार्टी, अपना दल सोनेलाल, बीजेपी के साथ गठबंधन में है. काउंटिंग को लेकर खूब बवाल हुआ लिहाज़ा घंटों तक रुकी काउंटिंग देर रात में जाकर पूरी हुई और केशव प्रसाद मौर्य सात हज़ार से ज्यादा वोट से हार गए. इस दौरान हंगामा होने के बाद खुद पल्लवी पटेल काउंटिंग सेंटर पर पहुंची. गौर करने वाली बात ये है कि सिराथू केशव मौर्य का गृह जनपद है, वो 2012 में यहां से सांसद तक रह चुके हैं. लेकिन इस मर्तबा जब पार्टी दो तिहाई बहुमत से प्रदेश में सरकार बनाने में कामयाब रही तो वहीं केशव मौर्य चुनाव हार गए. तो अब यहां से केशव प्रसाद मौर्य का भविष्य क्या दिख रहा है, क्या वही रूतबा जो पार्टी में उनका सालों से रहा है वो बना रहेगा या ये हार उस रुतबे पर बट्टा लगा देगी?
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सेना तो जीत गई लेकिन सेनापति की झोली में हार आई. प्रदेश के सीएम पुष्कर सिंह धामी खटीमा विधानसभा से करीब सात हजार वोट से कांग्रेस के भुवन कापड़ी से हार गए. धामी की इस हार की कई वजहें मानी जा रही हैं. जिनमें किसान आंदोलन, जातीय समीकरणों का फ़ेल होना, नामांकन के बाद खटीमा से उनकी दूरी... सिर्फ चार बार ही आए और दूसरी विधानसभाओं में ज़्यादा वक्त देना जैसे कुछ चीज़ें शामिल हैं. बीजेपी की इस जीत के बाद उत्तराखंड में ये पहली बार होगा जब कोई पार्टी लगातार दूसरी बार प्रदेश में सरकार बनाएगी.. लेकिन सवाल पुष्कर सिंह धामी को लेकर है ... क्या पार्टी उनको सीएम बनाए रखेगी? क्योंकि अगर हटाया तो एक इल्ज़ाम ये है कि बार-बार मुख्यमंत्री बदलने से विकास योजनाएं रुक जाती हैं और बनाए रखा तो पार्टी के अंदर हारे हुए सीएम के खिलाफ आवाज़ें उठ सकती हैं. तो अब यहां से पुष्कर सिंह धामी का भविष्य क्या है? और पार्टी पुष्कर सिंह धामी को हटा देती है सीएम कि कुर्सी से तो वो कौन कौन से नाम हैं जो पुष्कर सिंह की जगह ले सकते हैं?
उत्तर भारत की राजनीति के शोर में पूर्वोत्तर की राजनीति अक्सर दब जाती है. आप मणिपुर, असम, अरुणाचल, मेघालय, नागालैंड जैसे राज्यों पर राजनीतिक पंडितों की चर्चा बहुत कम ही देखते सुनते होंगे. और कल जिन राज्यों के परिणाम आए, उसमें एक राज्य पूर्वोत्तर का भी था. मणिपुर. जहां भाजपा 60 में से 32 सीटें लेकर सत्ता में लौटी और पिछली बार से बेहतर प्रदर्शन करती दिखी. वहीं कांग्रेस जो पिछली बार सबसे बड़ी पार्टी थी वो इस बार सिर्फ़ 5 सीटों पर सिमट गई. लिहाज़ा कांग्रेस के ढलान को लेकर वापस से बातें शुरू हो गई हैं. मगर इन्हीं सब के बीच एक और बहस शुरू हुई है, मणिपुर के सीएम को लेकर. कि प्रदेश का सीएम कौन होगा? वो इसलिए, क्योंकि पार्टी ने बीरेन सिंह, जो राज्य के मुख्यमंत्री रहे पिछले पांच साल उनको सीएम के तौर पर प्रोजेक्ट नहीं किया.
बीरेन सिंह को सीएम फेस ना बनाने की वजह उनके कार्यकाल में पार्टी में पनपे असंतुलन को बताया जाता है. बीजेपी को पिछले विधानसभा में पूर्ण बहुमत मिला नहीं था, तो नेशनल पीपुल्स पार्टी और टीएमसी से हाथ मिलाकर वो सत्ता तक पहुंची, लेकिन मैनेजमेंट की कमी दिखी. लिहाज़ा 2020 में पार्टी सत्ता से लगभग बाहर ही हो चुकी थी जब नेशनल पीपुल्स पार्टी और टीएमसी के विधायक ने इस्तीफा दे दिया. यही कारण था कि बीरेन सिंह के नेतृत्व पे सवाल उठाए गए. मगर इन बातों को ग़लत साबित करते बीजेपी सत्ता में आई और पूर्ण बहुमत से आई. तो अब ये सवाल उठने लगा हैं कि क्या पार्टी सीएम की कुर्सी के लिए कोई नया चेहरा तलाश रही है या अब बीरेन सिंह ही मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी जगह पक्की कर चुके हैं? इन ख़बरों पर विस्तार से चर्चा के अलावा ताज़ा हेडलाइंस, देश-विदेश के अख़बारों से सुर्खियां, आज के इतिहास की अहमियत सुनिए 'आज का दिन' में अमन गुप्ता के साथ.

दिल्ली के सदर बाजार में गोरखीमल धनपत राय की दुकान की रस्सी आज़ादी के बाद से ध्वजारोहण में निरंतर उपयोग की जाती है. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के बाद यह रस्सी नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाने लगी. इस रस्सी को सेना पूरी सम्मान के साथ लेने आती है, जो इसकी ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्ता को दर्शाता है. सदर बाजार की यह रस्सी भारत के स्वाधीनता संग्राम और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बनी हुई है. देखिए रिपोर्ट.

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दावोस में भारत वैश्विक आर्थिक चुनौतियों का सामना करने और एक बेहतर भविष्य बनाने के लिए पूरी तैयारी कर रहा है. इस संदर्भ में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव से खास बातचीत की गई जिसमें उन्होंने बताया कि AI को लेकर भारत की क्या योजना और दृष्टिकोण है. भारत ने तकनीकी विकास तथा नवाचार में तेजी लाई है ताकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे रह सके. देखिए.

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