
अपनी ही सीमाओं को दलदली बनाने में जुटे यूरोपीय देश, क्या यह रूस से बढ़ते तनाव का जवाब है?
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रूस-यूक्रेन जंग के बीच पूरा यूरोप डिफेंस के लिए नई-नई तरकीबें आजमा रहा है. कभी पेट्रोलिंग बढ़ाई जा रही है, तो कभी NATO की तर्ज पर यूरोपीय सेना बनाई जा रही है. रूस से सटी सीमा की वजह से फिनलैंड और पोलैंड इसे लेकर ज्यादा सतर्क हैं. अब वे अपने सीमाओं को दलदली बनाने की कोशिश में हैं, जिन्हें काफी मेहनत से दशकों पहले सुखाया गया था.
लगभग तीन साल पहले यूक्रेन ने कुछ ऐसा किया, जिससे सारी दुनिया हैरान रह गई. उसने राजधानी कीव के उत्तर में बहने वाली एक नदी पर बने अपने ही एक बांध को ब्लास्ट करके उड़ा दिया. देखते ही देखते सैकड़ों गांव पानी में डूब गए. लेकिन यूक्रेन ने ऐसा यूं ही नहीं किया था. वो अपनी सीमाओं पर दलदली जमीन तैयार कर रहा था ताकि रूस की सेना उसे लांघकर भीतर न आ सके. ये पीटलैंड डिफेंस सिस्टम है.
अब यूक्रेन के बाद पोलैंड और फिनलैंड भी यही करने जा रहे हैं. दरअसल दोनों के बॉर्डर रूस से लगे हुए हैं. फिनलैंड की तो रूस से काफी लंबी जमीनी सीमा है, लगभग डेढ़ हजार किलोमीटर. इसे लेकर वो काफी डरा हुआ है कि कहीं यूक्रेन के बाद उसपर हमला न हो जाए. यही वजह है कि देश पीटलैंड डिफेंस सिस्टम पर जोर दे रहे हैं.
पीटलैंड डिफेंस सिस्टम कोई सैन्य या आधुनिक तकनीकी रक्षा प्रणाली नहीं, बल्कि कुदरती डिफेंस मेकेनिज्म है, जो सदियों से काम करता रहा. ये वास्तव में दलदली जमीन होती है, जिनमें जमीन में पानी और उसमें पलने वाले पौधे होते हैं. यूरोप और रूस के उत्तरी इलाकों में ये जमीन कुदरती तौर पर मौजूद है.
सदियों पहले से ये सिस्टम रक्षात्मक कवच बना रहा, खासकर जमीनी लड़ाई में. सैन्य दस्ता, हाथी-घोड़े इस जगह को पार नहीं कर पाते. इससे उनकी चाल कमजोर पड़ जाती. भारत में भी राजा-महाराजा अपने किलों के चारों तरफ जमीन को दलदली बना लिया करते ताकि उन तक पहुंचना मुश्किल हो जाए.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पीटलैंड ने कई जगहों पर अड़ंगा लगाया. यूरोप के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों, खासकर फिनलैंड, पोलैंड और सोवियत संघ (अब रूस) में फैले ये गीले, कीचड़-भरे इलाके सैनिकों के लिए बुरे सपने की तरह साबित हुए.
जब जर्मनी ने साल 1941 में ऑपरेशन बारबरोसा के तहत सोवियत पर हमला किया, तब उसकी सेनाओं को बेलारूस और उत्तर-पश्चिमी रूस के दलदलों से होकर गुजरना पड़ा. वहां के पीटलैंड इतने गहरे और अस्थिर थे कि भारी टैंक और तोपखाने की गाड़ियां बार-बार धंस जाती थीं. जर्मन सैनिकों को कई किलोमीटर तक पैदल कीचड़ में चलना पड़ा. कई रास्ते में जख्मी हो गए. रसद पहुंचने में मुश्किल आने लगी. कुल मिलाकर, सारा मामला दलदली जमीन के चलते बिगड़ने लगा.

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