
11 जनवरी 1945... वो दिन, जब सिमरधा ने अंग्रेजों के सामने नहीं झुकाया सिर, लाठियां और कोड़े खाए
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11 जनवरी 1945. उत्तर प्रदेश में झांसी जिले के गरौठा इलाके का सिमरधा गांव. अंग्रेजों के फरमान के खिलाफ एक गांव का सामूहिक विद्रोह इतिहास में दर्ज है. उस दिन इस गांव में बगावत की आग ऐसी सुलगी कि चूल्हे नहीं जले, घर खाली रहे और अंग्रेजों ने बर्तन-भाडे़ तक बाहर फेंक दिया. आतंक से सहमे लोग खेत-खलिहानों में छिपे रहे. अंग्रेजी जुल्म के खिलाफ यह द्वितीय विश्व युद्ध के लिए 'न पाई, न भाई' देने के ऐलान का नतीजा था.
11 जनवरी 1945 की यह गौरव गाथा ग्राम सिमरधा को आज भी गौरवान्वित करती है. आजादी की जंग में इस गांव के स्वतंत्रता सेनानियों ने जान की परवाह नहीं की. हालात ऐसे बने कि घरों में चूल्हे तक नहीं जले, पूरा गांव खाली हो गया, लोग खेतों और फसलों के बीच छिप गए, लेकिन आजादी तक पहुंचने की आग उनके दिलों में बुझी नहीं.
11 जनवरी को सिमरधा के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं है. यह वह दिन है, जिसे गांव आज भी सबसे काले दिन के रूप में याद करता है, लेकिन इसी दिन ने सिमरधा को इतिहास में अमर भी कर दिया. इस दिन अंग्रेजी हुकूमत ने वो जुल्म किया, जिसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
अंग्रेजों के जुल्मों का गवाह है सिमरधा
उस दौर में पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ तन-मन से आजादी की अलख जगाने में जुटा था. बुंदेलखंड की धरती पहले से ही बगावत की आग में तप रही थी. सिमरधा भी उसी आग का एक बड़ा केंद्र था.
अंग्रेजी हुकूमत ने इंकलाब की आवाज दबाने के लिए पंडित काशीप्रसाद द्विवेदी समेत दर्जनों नौजवानों को तोड़ने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान और साहस अंग्रेजी अत्याचारों पर भारी पड़ा.

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