
न गाजा, न लेबनान... ईरान में लोगों का इस्लामी कट्टरपंथ से क्यों मोहभंग हो गया?
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ईरान को इस्लामी रिपब्लिक और कट्टरपंथ रास नहीं आया. आर्थिक तबाही, महिलाओं का दमन, भ्रष्टाचार आदि ने लोगों को सड़कों पर उतरने को मजबूर कर दिया है. ईरानी लोग सड़कों पर उतरकर 'तानाशाह मुर्दाबाद... इस्लामिक रिपब्लिक मुर्दाबाद... ना गाजा ना लेबनान के लिए, मेरी जिंदगी ईरान के लिए...' जैसे नारे लगा रहे हैं.
ईरान की जनता का इस्लामी कट्टरपंथ से मोहभंग गहरा चुका है. दिसंबर 2025 से शुरू हुए नए विरोध प्रदर्शनों ने इसे साफ कर दिया है. ये प्रदर्शन अब 100 से अधिक शहरों में फैल चुके हैं, जहां लोग सड़कों पर उतरकर 'तानाशाह मुर्दाबाद... इस्लामिक रिपब्लिक मुर्दाबाद... ना गाजा ना लेबनान के लिए, मेरी जिंदगी ईरान के लिए...' और वुमन, लाइफ, फ्रीडम जैसे नारे लगा रहे हैं. यह मोहभंग 2022 की महसा अमीनी की मौत से शुरू हुआ वुमन, लाइफ, फ्रीडम आंदोलन का विस्तार ही है, लेकिन अब ज्यादा तीव्र और व्यवस्था-विरोधी हो गया है.लोग कह रहे हैं कि हम ईरानी हैं, इस्लामी रिपब्लिक नहीं. अर्थात राष्ट्रीय पहचान को धार्मिक शासन से अलग कर रहे हैं. आर्थिक संकट (मुद्रास्फीति 52%, रियाल का पतन), भ्रष्टाचार, महिलाओं पर दमन, विदेशी नीतियों का बोझ और युवाओं का विद्रोह मुख्य कारण हैं.
प्रदर्शनकारियों में व्यापारी, छात्र और युवा आगे हैं, जो हड़तालें कर रहे हैं और सुरक्षा बलों से टकरा रहे हैं. सरकार ने इंटरनेट पर रोक लगा दी और आंदोलन को रोकने के लिए दमन का रास्ता चुना है. लेकिन जनता की नाराजगी दब नहीं रही. यह सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि पूरे इस्लामी गणराज्य को खारिज करने का आंदोलन बन चुका है. लोग अब सुधार नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन चाहते हैं.
1979 की इस्लामी क्रांति ने वादा किया था कि शाह की तानाशाही के बाद एक न्यायपूर्ण, धार्मिक और समृद्ध समाज बनेगा, लेकिन 46 साल बाद अधिकांश ईरानी इसे दमनकारी, भ्रष्ट और असफल मानते हैं. लोग अपने देश को अफगानिस्तान बनते नहीं देखना चाहते हैं. युवा उन देशों को देख रहे हैं जिन मुस्लिम देशों में कट्टरपंथ हावी नहीं है वहां किस तरह से तरक्की हो रही है.
1-आतंकी संगठनों के आर्थिक मदद से चीजें खराब हुईं
हिजबुल्लाह (लेबनान), हमास (गाजा), हौथी (यमन) और अन्य मिलिशिया को ईरान सरकार से मिलने वाली मदद ने जनता के बीच असंतोष को पैदा किया. अमेरिकी अनुमानों के अनुसार, ईरान हिजबुल्लाह को सालाना 700 मिलियन डॉलर और हमास तथा अन्य फिलिस्तीनी समूहों को 100 मिलियन डॉलर देता है. कुल मिलाकर इस तरह के गुटों पर ईरान सरकार अरबों डॉलर खर्च कर रहा है. जो ईरान की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डालते हैं.2025 में इजराइल-ईरान युद्ध (12-दिन का संघर्ष, जून 2025) ने स्थिति और बदतर कर दी. इस युद्ध में ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमले हुए, जिससे अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा. युद्ध के बाद कई तरह के सैंक्शंस लगे, रियाल का मूल्य रिकॉर्ड निचले स्तर (1.5 मिलियन प्रति डॉलर) पर गिरा, मुद्रास्फीति 52% पहुंची, और बिजली-पानी की किल्लत बढ़ी. जनता पूछती है कि हमारी गरीबी, बिजली कटौती, पानी की कमी सब इस जंग के लिए क्यों ? प्रदर्शनों में नारा गूंजता है कि नीदर गाजा नॉर लेबनान, माय लाइफ फॉर ईरान.इन स्लोगक का संदेश स्पष्ट है. यह स्लोगन विदेशी नीतियों को घरेलू संकट से जोड़ता है, और सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है. लोग मानते हैं कि ये खर्च घरेलू विकास पर लगने चाहिए.
2. युवा पीढ़ी का विद्रोह और सेकुलराइजेशन

ईरान के सैन्य ठिकानों पर इजरायल के ताबड़तोड़ हमले जारी है. ताजा मामले में IDF ने IRGC के नौसेना के हेडक्वार्टर पर एयर स्ट्राइक की है. हमले के बाद नौसेना का मुख्यालय पूरी तरह से तबाह हो गया. IDF ने हमले का वीडियो भी जारी किया है. यह मुख्यालय ईरानी शासन के एक विशाल सैन्य परिसर के भीतर स्थित था और इसका उपयोग वर्षों से वरिष्ठ नौसेना कमांडरों द्वारा इजरायल राज्य और मध्य पूर्व के अन्य देशों के खिलाफ परिचालन गतिविधियों का प्रबंधन करने और समुद्री आतंकवादी अभियानों को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता रहा था.

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