
'धुरंधर 2' में आदित्य धर ने 10 फैक्ट्स और फिक्शन के कॉम्बो से कैसे बुनी ब्लॉकबस्टर कहानी
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‘धुरंधर 2’ में पॉलिटिक्स सिर्फ बैकग्राउंड नहीं, बल्कि कहानी का एक बड़ा हिस्सा बनकर सामने आई है. नोटबंदी, रियल लाइफ से इंस्पायर्ड किरदार और विजुअल नैरेटिव के जरिए फिल्म फैक्ट और फिक्शन को इस तरह मिलाती है कि फर्क करना मुश्किल हो जाता है. आदित्य धर का यही स्टाइल इसे ब्लॉकबस्टर बनाता है.
'धुरंधर' में आदित्य धर की कहानी में नजर आए पॉलिटिकल रंगों की होली सोशल मीडिया पर खूब खेली गई थी. कोई इन रंगों में सराबोर हो रहा था, तो कोई दामन बचाकर भाग निकलना चाहता था. मगर पहली फिल्म के नैरेटिव ने ही 'धुरंधर 2' के लिए पॉलिटिकल जमीन भी तैयार कर दी थी. ‘धुरंधर’ में जब आर माधवन का किरदार भविष्य में आने वाली मजबूत भारत सरकार के लिए आशावादी हो रहा था, तो ये स्पष्ट था कि फिल्म की पॉलिटिक्स आगे कहां मुड़ने वाली है.
मगर 'धुरंधर 2' का सरप्राइज ये है कि इस बार पॉलिटिक्स वाला रंग फिल्म पर पहले से भी ज्यादा चढ़ा हुआ है. और इस बार फिल्म अपने रंग लगा अंग छुपाने का संकोच पूरी तरह किनारे करके उतरी है. पिछले कुछ सालों से फिल्मों में ये कोई नई बात भी नहीं है. मगर 'धुरंधर 2' की खासियत ये है कि पॉलिटिक्स फिल्म के नैरेटिव में इस कदर घुली है कि फैक्ट्स और फिक्शन को एक दूसरे से अलग करके देख पाना मुश्किल है.
फैक्ट्स और फिक्शन की लस्सी बनाने वाला धुरंधर पॉलिटिक्स के दो हिस्से होते हैं. एक वो जो संसद से सड़क तक नेताओं के भाषणों में दिखाई-सुनाई देता है. दूसरा हिस्सा चाय के अड्डों और केश सज्जा की दुकानों में मिलता है. ये पॉलिटिक्स में रुचि लेने वाले आम आदमी की कल्पना है, जो कागज पर शब्दों के बीच से झांकती खाली जगहों को पढ़ डालने का आनंद पाना चाहता है. 2016 में जब खबर आई कि भारत ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है, तो लोग इसके फोटो-वीडियो देखना चाहते थे.
सबका मकसद देश की विपक्षी पार्टी की तरह सत्ता पक्ष को घेरना नहीं था. ये इंसानी दिमाग की नेचुरल जिज्ञासा है कि उसे इन्फॉर्मेशन का विजुअल चाहिए. और सोशल मीडिया के दौर में हर जिज्ञासा का सामूहिक हो जाना बहुत फास्ट और फ्यूरियस होता है. लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक जैसी चीज देश की सुरक्षा, विदेश नीति, राजनीति वगैरह से जुड़ा भारी मैटर है. इसकी सारी जानकारी ऐसे ही थोड़ी न पब्लिक में बांट दी जाएगी! आधिकारिक सूत्रों से जितनी जानकारी सामने आई, उसमें दिमागों की जिज्ञासा ने रीडिंग्स निकालनी शुरू कर दीं— यूं हुआ होगा, वैसे घुसे होंगे, इस तरह मारा होगा. मगर ये जिज्ञासा पूरी तरह शांत की आदित्य धर ने, फिल्म 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक' (2019) से.
पक्की, कन्फर्म जानकारी फिल्म में भी उतनी ही थी जितनी हम तक खबरों ने पहुंचाई. लेकिन फिल्म ने इन्फॉर्मेशन को विजुअल दे दिए. आदित्य धर के प्रोडक्शन में बनी 'आर्टिकल 370' में भी कुछ ऐसा ही हुआ. लेकिन इस तरह के 'खाली स्थान भरो' सिनेमा की खासियत होती है कि फिल्म में जो क्रिएटिव लिबर्टी ली जाती हैं, वो विजुअल्स के साथ दिमाग में बैठने लगती हैं और फिक्शन, फैक्ट्स की जगह लेने लगता है. कई बार रियल घटनाओं पर चर्चा करते हुए लोग बोलते हैं— 'उस फिल्म में भी थी ये चीज!' तो फिल्ममेकिंग के धुरंधर आदित्य धर यही काम बहुत अच्छे से कर लेते हैं और यही चीज 'धुरंधर 2' को बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर बनाने वाली है. (वॉर्निंग— इसके आगे आपको फिल्म के कुछ स्पॉइलर मिल सकते हैं)
कितना फैक्ट कितना फिक्शन? ‘धुरंधर’ के दोनों पार्ट्स को एक पूरी कहानी की तरह देखें तो रणवीर सिंह का किरदार जसकीरत सिंह रांगी उर्फ हमजा अली मजारी फिक्शन है. लेकिन रहमान डकैत पाकिस्तान में एक रियल खूंखार गैंगस्टर हुआ है. मेजर इकबाल का किरदार भारत के लिए नासूर रहे कई आतंकियों को मिलाकर तैयार किया गया लगता है. उसका लुक पाकिस्तानी आतंकी इलियास कश्मीरी जैसा है, लेकिन काम कई अलग-अलग आतंकियों से मिलते हैं.













