
जॉर्जिया के एक रिजॉर्ट में 11 भारतीयों की मौत, कार्बन मोनोऑक्साइड बनी वजह
AajTak
जॉर्जियाई गृह मंत्रालय की ओर से 14 दिसंबर को जारी एक बयान के अनुसार, किसी भी पीड़ित पर हिंसा या शारीरिक चोट के कोई निशान नहीं थे. स्थानीय मीडिया ने पुलिस के हवाले से बताया कि सभी पीड़ितों की मौत कार्बन मोनोऑक्साइड पॉइजनिंग से हुई है.
जॉर्जिया के गुडौरी में पहाड़ी रिसॉर्ट के एक रेस्तरां में 12 लोग मृत पाए गए थे. इनमें से 11 भारतीय नागरिक थे. जॉर्जिया में भारतीय मिशन ने इसकी पुष्टि की है. शुरुआती रिपोर्ट्स से पता चलता है कि मौतें संभवतः कार्बन मोनोऑक्साइड पॉइजनिंग के कारण हुई हैं.
'शवों को स्वदेश भेजने के लिए काम कर रहे'
जॉर्जिया में स्थित भारतीय मिशन ने 16 दिसंबर को एक बयान जारी कर कहा, 'त्बिलिसी में स्थित भारतीय दूतावास जॉर्जिया के गुडौरी में 11 भारतीय नागरिकों के दुर्भाग्यपूर्ण निधन की खबर से दुखी है और उनके परिवारों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता है. दूतावास स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर काम कर रहा है ताकि शवों को जल्द से जल्द स्वदेश भेजा जा सके. हम शोक संतप्त परिवारों के भी संपर्क में हैं और हर संभव मदद मुहैया कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं.'
शरीर पर नहीं मिले चोट के निशान
14 दिसंबर को जॉर्जियाई गृह मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, किसी भी पीड़ित पर हिंसा या शारीरिक चोट के कोई निशान नहीं थे. स्थानीय मीडिया ने पुलिस के हवाले से बताया कि सभी पीड़ितों की मौत कार्बन मोनोऑक्साइड पॉइजनिंग से हुई है.
क्या बिजली जनरेटर बना मौत की वजह?

स्विट्ज़रलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम से पहले पाकिस्तान पर दबाव और विरोध का स्तर बढ़ गया है. पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट (PTM) और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने स्थानीय सड़कों पर पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाए, जिनमें पाकिस्तानी सेना और प्रधानमंत्री पर गंभीर आरोप लगे. वे आरोप लगाते हैं कि सेना जबरन गायब करने, फर्जी मुठभेड़ों में हत्याओं और खनिज संसाधनों की लूट में शामिल है.

संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद जायेद अल नहयान के भारत दौरे ने पाकिस्तान में फिर से पुरानी डिबेट छेड़ दी है. पाकिस्तान के विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तानी नेतृत्व की वजह से हमें भारत की तुलना में हमेशा कमतर आंका जाता है. पाकिस्तान में इस दौरे को मिडिल ईस्ट मे पैदा हुए हालात और सऊदी अरब -पाकिस्तान के संबंधों के बरक्श देखा जा रहा है.

यूरोप में कुछ बेहद तेजी से दरक रहा है. ये यूरोपीय संघ और अमेरिका का रिश्ता है, जिसकी मिसालें दी जाती थीं. छोटा‑मोटा झगड़ा पहले से था, लेकिन ग्रीनलैंड ने इसे बड़ा कर दिया. डोनाल्ड ट्रंप लगातार दोहरा रहे हैं कि उन्हें हर हाल में ग्रीनलैंड चाहिए. यूरोप अड़ा हुआ है कि अमेरिका ही विस्तारवादी हो जाए तो किसकी मिसालें दी जाएंगी.

डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जा चाहते हैं. उनका मानना है कि डेनमार्क के अधीन आने वाला यह अर्द्ध स्वायत्त देश अमेरिका की सुरक्षा के लिए जरूरी है. इसे पाने के लिए वे सैन्य जोर भी लगा सकते हैं. इधर ग्रीनलैंड के पास सेना के नाम पर डेनिश मिलिट्री है. साथ ही बर्फीले इलाके हैं, जहां आम सैनिक नहीं पहुंच सकते.









