
ईरान में 'ट्रंप क्रांति'! शहर-शहर बगावत के शोले, क्या फिर वापस आएगा राजतंत्र?
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ईरान में 12 दिनों से जारी प्रदर्शन रजा पहलवी के आह्वान पर जोर पकड़ रहे हैं. प्रदर्शनकारियों ने सरकार और सुप्रीम लीडर खामेनेई के खिलाफ नारे लगाए, कई मस्जिदों और इमारतों को आग लगाई गई. सरकार ने इंटरनेट बंद कर प्रदर्शन को रोकने की कोशिश की, लेकिन जनता का गुस्सा कम नहीं हुआ है.
'मुल्लाओं को ईरान से जाना होगा', 'आजादी-आजादी', 'खामेनेई मुर्दाबाद', 'यह आखिरी लड़ाई है! पहलवी लौटेंगे', गुरुवार रात 8 बजे इन नारों से पूरा ईरान गूंज उठा. निर्वासन में रह रहे ईरान के प्रिंस रजा पहलवी के आह्वान पर पिछले 12 दिनों से प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों में नया जोश जग गया है. गुरुवार के बाद अब शुक्रवार यानी जुमेरात के दिन भी इसी तरह के जोरदार प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है. ईरान के सभी 31 प्रांतों में हो रहे इन प्रदर्शनों ने इस्लामिक गणतंत्र के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की नींद उड़ा दी है.
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान मान रहे हैं कि जिस आर्थिक कारण से लोग सड़कों पर उतरे हैं उस हालात की जिम्मेदार सरकार है. उनकी सरकार सुधार की हरसंभव कोशिश कर रही है और सरकार की तरफ से दी जानेवाली सब्सिडी को तीन गुना बढ़ा दिया गया है. सरकार ने व्यापारियों और खुदरा दुकानदारों को कीमतें बढ़ाने और जमाखोरी के खिलाफ कड़ी चेतावनी भी जारी की है.
इन कोशिशों के बावजूद, प्रदर्शनकारियों पर कोई असर नहीं हो रहा है और उनका गुस्सा बढ़ता जा रहा है. गुरुवार रात हुए प्रदर्शन में कई मस्जिदों और इमारतों को आग लगा दी गई.
प्रदर्शन को और अधिक फैलने से रोकने के लिए ईरान की सरकार ने गुरुवार रात प्रदर्शन शुरू होने से पहले इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी. ईरान को अंतरराष्ट्रीय टेलीफोन कॉल से भी पूरी तरह काट दिया गया.
शुक्रवार सुबह तक चले ये प्रदर्शन इस बात की पहली परीक्षा माने जा रहे हैं कि क्या ईरानी जनता क्राउन प्रिंस रजा पहलवी के प्रभाव में आ सकती है. उन्होंने कहा भी है कि इन दो दिनों के आंदोलन में जनता की प्रतिक्रिया के बाद वो अपने आगे का प्लान तय करेंगे.
रजा पहलवी के पिता, ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रजा पहलवी, 1979 की इस्लामी क्रांति से ठीक पहले देश छोड़कर चले गए थे और बाद में उनका निधन हो गया. ईरान के हालिया प्रदर्शनों में शाह का समर्थन देखा जा रहा है. ईरान में पहले शाह के समर्थन में नारे लगाने पर मौत की सजा दी जाती थी. बावजूद इसके प्रदर्शनकारी शाह के समर्थन में नारेबाजी करते देखे गए हैं.

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