)
Dol Purnima 2026: क्या होती है डोल पूर्णिमा, कब और कहां मनाया जाएगा ये उत्सव? जानें पूजन विधि, व्रत नियम और महत्व
Zee News
What is Dol Purnima 2026: हिंदू धर्म में पूर्णिमा और अमावस्या तिथि का विशेष महत्व है. एक शुक्ल पक्ष का आखिरी दिन होता है तो दूसरा कृष्ण पक्ष का आखिरी तिथि. लेकिन क्या आप जानते हैं कि डोल पूर्णिमा क्या होती, कहां मनाई जाती है और इस त्योहार से जुड़े खास नियम क्या-क्या हैं. अगर नहीं, तो आइए जानते हैं.
Dol Purnima 2026 Date Importance: वैसे तो हर महीने की पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व होता है, लेकिन फाल्गुन महीने की पूर्णिमा का अपना अलग महत्व है. इस पूर्णिमा को डोल पूर्णिमा, डोल यात्रा या डोल उत्सव कहते हैं. डोल पूर्णिमा का उत्सव पश्चिम बंगाल, ओडिशा, त्रिपुरा और असम में हर्ष और उल्लास के साथ मनाई जाती है. शास्त्रों के अनुसार यह उत्सव राधा-कृष्ण के अटूट प्रेम को समर्पित है. इसलिए इस दिन लोग भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी को डोली में झुलाते हैं और उन्हें अबीर-गुलाल अर्पित करते हैं. हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल भी डोल पूर्णिमा का उत्सव फाल्गुन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. आइए जानते हैं कि डोल पूर्णिमा की सही तारीख, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजन विधि क्या है.
2026 में कब है डोल पूर्णिमा
सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार, डोल पूर्णिमा फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि के दिन मनाई जाती है. दृक पंचांग के अनुसार, इस साल फाल्गुन पूर्णिमा 2 मार्च को शाम 5 बजकर 55 मिनट से शुरू होगी. जबकि, इस तिथि की समाप्ति 3 मार्च 2026 को शाम 5 बजकर 06 मिनट पर होगी. ऐसे में उदया तिथि को मान्यता देने वाले लोग इस साल 3 मार्च को ही डोल पूर्णिमा मनाएंगे.
डोल पूर्णिमा का पौराणिक महत्व
डोल पूर्णिमा का पर्व भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के अलौकिक प्रेम को समर्पित है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी विशेष दिन भगवान कृष्ण ने राधा जी के प्रति अपने प्रेम को प्रकट किया था. कहते हैं कि जब राधा रानी अपनी सखियों के साथ झूला झूल रही थीं, तब कान्हा ने प्रेम स्वरूप उनके चेहरे पर गुलाल लगाया था. पालकी या झूले को ही डोल कहा जाता है और इसी कारण इस मिलन के उत्सव को डोल जात्रा या डोल यात्रा के रूप में मनाया जाने लगा. यही वजह है कि आज भी पारंपरिक रूप से इस उत्सव में गीले रंगों के बजाय सूखे अबीर-गुलाल का अधिक महत्व है.
