
जहन्नुम में जाएगा तालाब, कुआं और झील के पानी को गंदा करने वाला शख्स, जानिए ; NGT ने क्यों कहा ऐसा ?
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एनजीटी ने कहा, ’’भारत में, हमारे पास कम से कम ऐसे लिखित ग्रंथ हैं जो यह दिखाते हैं कि कुदरत और मौहौलियात को वाजिब इज्जत दिया गया है. उनके साथ एहतराम से पेश आया गया है और इस मुल्क के लोगों ने उसे पूजा है.
नई दिल्लीः राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने जुमे को वेदों और पुराणों का हवाला देते हुए कहा कि जो शख्स तालाब, कुआं और झील का पानी गंदा करता है वह जहन्नम में जाता है. अधिकरण ने कहा कि पर्यावरण का संरक्षण पश्चिम का अनूठा विचार या कुछ ऐसी चीज नहीं है जो कुछ दशक पहले या कुछ सदी पहले आई हो. एनजीटी ने कहा, ‘‘इसके बजाय, भारत में, हमारे पास कम से कम ऐसे लिखित ग्रंथ हैं जो यह दिखाते हैं कि कुदरत और मौहौलियात को वाजिब सम्मान दिया गया है. उनके साथ एहतराम से पेश आया गया है और इस मुल्क के लोगों ने उसे पूजा है. ट्रिब्यूनल ने कहा कि हमारे वैदिक साहित्य यह बताते हैं कि इंसानी जिस्म को पंच तत्वों से बना माना गया है जिनमें आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी शामिल हैं. प्रकृति ने इन तत्वों और जीवों के बीच एक संतुलन रखा है. ट्रिब्यूनल ने बेंगलुरू में गोदरेज प्रापर्टीज लिमिटेड और वंडर प्रोजेक्ट्स डेवलपमेंट प्रा. लि. की बहुमंजिला लग्जरी परियोजना को मिली पर्यावरण मंजूरी रद्द करते हुए यह तंकीद की है. साथ ही, इन्हें फौरन ध्वस्त करने का भी हुक्म दिया है. वैदिक साहित्य में पानी की बताई गई है अहमियत एनजीटी सदर न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल ने कहा कि अनंतकाल या वैदिक या पूर्व वैदिक काल से हमने पाया है कि भारतीय उपमहाद्वीप में साधु-संत ऋषि मुनि बहुत बड़े दूरदर्शी रहे हैं. उन्होंने दुनिया की तामीर को वैज्ञानिक तरीके से समझाया है. उन्होंने ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्यों का पूरी बुद्धिमत्ता के साथ रहस्योदघाटन किया है. ट्रिब्यूनल ने कहा कि प्रकृति के करीब लोगों को लाने के लिए प्राचीन भारत में बुद्धिजीवियों ने इसे मजहबी रूप दिया ताकि लोग कुदरत के बारे में उपदेशों को आदेश के तौर पर लें और उसके संरक्षण के लिए हर कदम उठाएं. एनजीटी ने कहा कि वैदिक साहित्य में जल को बहुत उच्च सम्मान दिया गया है.
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